नई दिल्ली, 11.Feb.26 | केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को पत्रकारों से कहा, “कम से कम 20-25 कांग्रेस MP लोकसभा स्पीकर के चैंबर में घुस गए और उन्हें गालियां दीं। मैं भी वहीं था। स्पीकर बहुत नरम इंसान हैं, नहीं तो सख्त कार्रवाई होती। प्रियंका गांधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल समेत सीनियर कांग्रेस नेता भी अंदर मौजूद थे, और वे उन्हें लड़ने के लिए उकसा रहे थे।”
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहाँ कभी-कभी संसद की कार्यवाही कम और “राजनीतिक नाट्य महोत्सव” ज़्यादा चलता दिख जाता है। ताज़ा प्रकरण भी कुछ ऐसा ही चित्र खींचता है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju का यह सनसनीखेज दावा कि 20 से 25 कांग्रेस सांसद सीधे लोकसभा स्पीकर Om Birla के चैंबर में घुस गए और गाली-गलौज पर उतर आए सुनकर लगा जैसे संसद भवन के भीतर लोकतांत्रिक बहस नहीं, बल्कि “गुस्सा प्रबंधन कार्यशाला” चल रही हो… और वह भी बिना अनुमति के।
मामलें की परत तब और मोटी हो जाती है जब आरोपों में यह भी कहा गया कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान Priyanka Gandhi Vadra और K. C. Venugopal जैसे वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे। अब जनता के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है क्या यह विरोध था या “सीनियर लीडरशिप सुपरविजन में फील्ड ट्रेनिंग”? क्या सीनियर नेता शांति स्थापित करने पहुँचे थे… या फिर यह देखने कि हंगामा निर्धारित मानकों के अनुरूप हो रहा है या नहीं? राजनीति में विरोध स्वाभाविक है, पर यदि विरोध का स्तर स्पीकर कक्ष तक पहुँच जाए, तो वह संसदीय असहमति कम और राजनीतिक ‘ओवरएक्टिंग’ ज़्यादा लगने लगता है।
कांग्रेस की राजनीति का यह दृश्य इसलिए भी व्यंग्य का विषय बनता है क्योंकि यही दल हर मंच से संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान का सबसे लंबा व्याख्यान देता है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाषा “संविधान बचाओ”… और आरोपों के मुताबिक व्यवहार “स्पीकर कक्ष घेरो”! जनता अब इस विरोध की शैली को देखकर यही कहती है कि कांग्रेस ने संसदीय प्रक्रिया को भी इवेंट मैनेजमेंट मॉडल पर डाल दिया है पहले नारेबाज़ी, फिर पोस्टर, फिर वेल, और अब डायरेक्ट चैंबर एंट्री… यानी विरोध का ‘प्रीमियम पैकेज’ लॉन्च हो चुका है।
विडंबना का शिखर यह है कि जिस स्पीकर को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, उसी के कक्ष में जाकर कथित हंगामे के आरोप लग रहे हैं। यह वैसा ही दृश्य बनाता है जैसे मैच शुरू होने से पहले ही टीम अंपायर रूम में घुसकर फैसला बदलवाने पहुँच जाए। संसदीय लोकतंत्र में स्पीकर अंपायर होते हैं लेकिन कांग्रेस का व्यवहार देखकर लगता है कि उन्हें विपक्षी टीम का खिलाड़ी मान लिया गया है, जिसे दबाव में लाकर स्कोरबोर्ड बदला जा सकता है।
Kiren Rijiju का यह कहना कि “स्पीकर बहुत नरम इंसान हैं, नहीं तो सख्त कार्रवाई होती” इस पूरे व्यंग्य को और धार देता है। यानी स्थिति ऐसी बन गई थी कि अनुशासन की जगह संयम ने मामला संभाला। सवाल यह है कि यदि संसदीय गरिमा का संतुलन भी अब व्यक्तित्व की नरमी पर टिके, तो फिर नियम पुस्तिका का क्या होगा?
अब जब 9 मार्च को स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा की संभावना जताई जा रही है, तब यह पूरा प्रकरण और भी राजनीतिक व्यंग्य का रूप ले लेता है। बाहर प्रस्ताव, अंदर टकराव ,यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम और “प्रेशर पॉलिटिक्स का ट्रेलर” ज़्यादा प्रतीत होता है। कांग्रेस का विरोध अब वैचारिक कम, दृश्यात्मक ज़्यादा दिखने लगा है जहाँ बहस की तैयारी से अधिक हंगामे की रिहर्सल होती है।
जनता इस पूरे घटनाक्रम को देखकर एक अजीब द्वंद्व में है जिन नेताओं को उसने कानून बनाने भेजा था, वे अब दृश्य निर्माण में व्यस्त दिखते हैं। संसद की कार्यवाही अब विधायी कम और नाटकीय ज़्यादा प्रतीत होने लगती है। और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा व्यंग्य है लोकतंत्र बचाने का दावा करने का स्वर जितना ऊँचा होता है, संसदीय मर्यादा का स्तर उतना ही नीचे गिरता दिखाई देता है।
अंततः यह प्रकरण केवल आरोप-प्रत्यारोप का मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कार का दर्पण बन गया है। विपक्ष का दायित्व सरकार को घेरना है पर यदि घेराबंदी स्पीकर कक्ष तक पहुँच जाए, तो लोकतंत्र के सभी component असहज हो उठता है। व्यंग्य यही है कांग्रेस विरोध को आंदोलन कहती है, सत्ता पक्ष उसे अराजकता कहता है… और जनता उसे “संसद का नया रियलिटी शो” मानकर देखती रह जाती है।
