मुजफ्फरपुर (बिहार), 13.Feb.26 |बिहार में NDA की सरकार है। सत्ता में भारतीय जनता पार्टी साझेदार है। मंचों से “सुरक्षा, सुशासन और कानून का राज” के दावे किए जाते हैं लेकिन मुजफ्फरपुर स्थित गायघाट ब्लाॅक के बेरुआ पंचायत से सामने आई घटना इन दावों को जमीनी हकीकत पर कटघरे में खड़ा करती दिख रही है। यहां एक भाजपा समर्थक को कथित तौर पर सिर्फ इसलिए बेरहमी से पीट-पीटकर हड्डियां तोड़ दिया गया क्योंकि वह खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा एवं सहयोगी दलों का समर्थक था। सवाल यह नहीं कि हमला हुआ सवाल यह है कि क्या अब बिहार भी पश्चिम बंगाल की राह पर चल पड़ा है!


पीड़ित देवी राय ने अपने लिखित आवेदन में जो आरोप लगाए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक तनाव की खतरनाक परतें भी खोलते हैं। उनके मुताबिक 29 जनवरी 2026 को गो टोली हाईवे चौक पर गांव के कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया। पहले रंगदारी मांगी गई, फिर राजनीतिक पहचान पर हमला बोला गया। कथित तौर पर उनसे कहा गया “यादव जाति के होकर भाजपा और मोदी का समर्थन करता है… तुम्हें सबक सिखाएंगे।” यानी विवाद सिर्फ पैसे या निजी दुश्मनी का नहीं, बल्कि जाति बनाम विचारधारा के टकराव का रूप लेता दिखा।
शिकायत के अनुसार विरोध करते ही देवी राय पर जानलेवा हमला कर दिया गया। लात-घूंसों से की गई मारपीट इतनी बर्बर बताई गई है कि उनके कंधे और पीठ की हड्डी तक टूट गई। उन्हें पहले स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और हालत गंभीर होने पर श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH), मुजफ्फरपुर रेफर करना पड़ा। मेडिकल जांच में गंभीर चोटों की पुष्टि भी बताई जा रही है। एक राजनीतिक समर्थक की यह हालत सिर्फ विचार व्यक्त करने की कीमत?

मामले को और संवेदनशील बनाता है पीड़ित का यह आरोप कि उन्होंने क्षेत्र की भाजपा विधायक कोमल सिंह के चुनाव में खुलकर समर्थन किया था। जमीनी स्तर पर प्रचार किया, संगठन के साथ खड़े रहे लेकिन आज वही राजनीतिक पहचान उनके लिए खतरा बन गई। सवाल उठता है क्या जमीनी कार्यकर्ता चुनाव के समय “संपत्ति” और बाद में “असुरक्षित नागरिक” बन जाते हैं?
सबसे बड़ा और सबसे असहज करने वाला सवाल पुलिस की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। पीड़ित का कहना है कि उन्होंने लिखित शिकायत दी, मेडिकल कराया, एक्स-रे रिपोर्ट तैयार है लेकिन इसके बावजूद गायघाट थाना में अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। यही वह बिंदु है जहां मामला सिर्फ मारपीट से उठकर “प्रशासनिक निष्क्रियता” की श्रेणी में प्रवेश कर जाता है। क्या दबाव है? किसका दबाव है? या फिर राजनीतिक पहचान के आधार पर शिकायत की गंभीरता तय हो रही है?
आवेदन में संजय राय, अभिषेक राय और पंकज राय समेत अन्य लोगों को नामजद आरोपी बताया गया है। पीड़ित का यह भी आरोप है कि यह पहला हमला नहीं है इससे पहले भी उनके परिवार को निशाना बनाया जा चुका है। यानी यह एक बार की हिंसा नहीं, बल्कि लगातार बनता दबाव का माहौल बताया जा रहा है।
आज स्थिति यह बताई जा रही है कि पूरा परिवार दहशत में है। जान का खतरा महसूस कर रहा है। सुरक्षा की मांग कर रहा है। लेकिन पुलिस कार्रवाई का इंतजार अब भी जारी है। यही इंतजार इस मामले को और विस्फोटक बना रहा है।
यह घटना अब सिर्फ एक गांव की मारपीट की खबर नहीं रह गई यह कई बड़े राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न खड़े कर रही है। क्या बिहार में NDA सरकार रहते हुए भी भाजपा समर्थक सुरक्षित नहीं? क्या जातीय पहचान के भीतर राजनीतिक स्वतंत्रता की जगह नहीं बची? क्या किसी खास दल का समर्थन करना गांव-समाज में हिंसा का कारण बनता जा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल अगर सत्ता समर्थक ही असुरक्षित हैं, तो विपक्ष समर्थकों की सुरक्षा का पैमाना क्या होगा?
अब सबसे कड़ा और असहज सवाल यही उठता है कि क्या बिहार में भाजपा के जमीनी समर्थक यूँ ही पिटते रहेंगे और सिस्टम खामोश तमाशबीन बना रहेगा? क्या पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता सिर्फ चुनाव के समय याद किए जाएंगे और संकट की घड़ी में उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा? अगर शिकायत, मेडिकल रिपोर्ट और नामजद आरोपियों के बावजूद पुलिस कार्रवाई सुस्त ही रही, तो यह संदेश जाएगा कि भाजपा समर्थक मार खाते रहें और पुलिस आराम करती रहे। यह सिर्फ कानून व्यवस्था पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संरचना की विश्वसनीयता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है क्योंकि जब समर्थक ही असुरक्षित महसूस करने लगें, तो लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर होने लगती हैं|


