कमंडल बनाम मंडल 2.0: क्या ठाकुर–ब्राह्मण राजनीति को किनारे कर रहा है नया सियासी एजेंडा?
पटना से दिल्ली तक आज राजनीति किसी विकास मॉडल पर नहीं, बल्कि जातीय पहचान की प्रयोगशाला में चल रही है। सवाल साफ़ है—
क्या मंडल की राजनीति एक बार फिर कमंडल को निगलने की तैयारी में है, या यह विपक्ष की सोची-समझी चुनावी चाल है?
जिस तरह जातीय जनगणना, आरक्षण की सीमा, और सामाजिक न्याय के नारे लगातार उछाले जा रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि विपक्ष जानबूझकर सवर्ण राजनीति को “विलेन” बनाकर पेश कर रहा है।
ठाकुर, ब्राह्मण और भूमिहार वोट बैंक को यह कहकर घेरा जा रहा है कि सत्ता पर इनका वर्चस्व रहा है—जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि सबसे ज़्यादा टैक्स, सबसे ज़्यादा ज़मीन विवाद और सबसे ज़्यादा राजनीतिक नुकसान भी इन्हीं वर्गों ने झेला है।
राजनीतिक पंडित मानते हैं कि यह रणनीति भावनाओं को भड़काने की है, ताकि चुनाव विकास बनाम बेरोज़गारी से हटकर जाति बनाम जाति में बदल जाए।
मंडल की राजनीति आज सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि सत्ता हथियाने का औज़ार बन चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कमंडल राजनीति इस हमले का जवाब दे पाएगी, या एक बार फिर ठाकुर-ब्राह्मण वोट सिर्फ़ “सेफ” मानकर छोड़ दिए जाएंगे?
अगर ऐसा हुआ, तो यह सिर्फ़ एक चुनावी हार नहीं होगी—
बल्कि भारतीय राजनीति के सामाजिक संतुलन की हार होगी।
