News (समाचार)
नई दिल्ली/ढाका।
भारत के पड़ोस में स्थित बांग्लादेश आज लोकतंत्र की कब्र पर खड़ा है, और अफसोस की बात यह है कि भारत की मोदी सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर जानबूझकर आँखें मूँदे बैठी है। सड़कों पर लहू बह रहा है, विपक्ष जेलों में ठूँसा जा रहा है, मीडिया की आवाज़ दबाई जा रही है और अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं—लेकिन नई दिल्ली से सिर्फ शर्मनाक चुप्पी सुनाई दे रही है।
विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार ने लोकतांत्रिक मूल्यों को सत्ता-सुविधा और रणनीतिक स्वार्थों के बदले गिरवी रख दिया है। जिस भारत ने कभी पड़ोसी देशों में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात की थी, वही भारत आज एक दमनकारी सत्ता के साथ खड़ा दिख रहा है।
बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया मज़ाक बन चुकी है, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी आम बात हो गई है और छात्रों पर गोलियाँ चल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सवाल उठा रहे हैं, लेकिन भारत सरकार चुप्पी की ओट में अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है।
विपक्षी दलों का कहना है कि मोदी सरकार की यह नीति न कूटनीति है, न ही राष्ट्रीय हित—बल्कि यह विदेश नीति की खुली विफलता है। चीन के डर से लोकतंत्र की बलि देना न केवल कायरता है, बल्कि आने वाले समय में भारत की सीमा सुरक्षा और आंतरिक शांति के लिए भी बड़ा खतरा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब-जब भारत ने पड़ोस में लोकतंत्र के दमन पर चुप्पी साधी है, तब-तब कट्टरपंथ और अराजक ताकतों को बढ़ावा मिला है। आज बांग्लादेश में जो हो रहा है, उसका खामियाजा कल भारत को भुगतना पड़ सकता है।
विपक्ष ने सीधा सवाल उठाया है—
क्या मोदी सरकार सिर्फ सत्ता में बैठे शासकों की मित्र है,
या फिर जनता और लोकतंत्र की भी कोई अहमियत है?
अगर आज भी भारत नहीं बोला, तो इतिहास यह दर्ज करेगा कि
जब पड़ोस में लोकतंत्र मर रहा था, तब भारत की सरकार सत्ता-सौदेबाज़ी में व्यस्त थी।
