
New Delhi/ Dhaka । बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली और चर्चित नेताओं में शुमार, देश की पहली महिला प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने ढाका के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली, जहां वे लंबे समय से गंभीर बीमारी के कारण इलाजरत थीं। उनके निधन की खबर सामने आते ही बांग्लादेश की राजनीति, प्रशासनिक हलकों और आम जनता में शोक की लहर दौड़ गई।
ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास की एक निर्णायक शख्सियत रही हैं। वे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष थीं और उन्होंने दो बार देश के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1991 में वे पहली बार प्रधानमंत्री बनीं और इसी के साथ उन्होंने इतिहास रचते हुए बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त किया। इसके बाद 2001 से 2006 तक उन्होंने दूसरी बार सरकार का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल को संसदीय लोकतंत्र की बहाली और सत्ता के संतुलन के लिहाज से अहम माना जाता है।
उनका राजनीतिक जीवन संघर्षों और टकरावों से भरा रहा। तत्कालीन राष्ट्रपति और बाद में प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बांग्लादेश की राजनीति में “बैटल ऑफ बेगम्स” के नाम से जाना जाता है। यह प्रतिद्वंद्विता दशकों तक देश की राजनीति की दिशा तय करती रही। जहां एक ओर उनके समर्थक उन्हें लोकतंत्र की मजबूत आवाज मानते हैं, वहीं उनके आलोचक उनके कार्यकाल को विवादों से जोड़कर देखते रहे हैं।
निजी जीवन में ख़ालिदा ज़िया बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान की पत्नी थीं। पति की हत्या के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे देश की सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल हो गईं। अपने लंबे राजनीतिक करियर के दौरान उन्हें कई कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद वे विपक्ष की एक मजबूत प्रतीक बनी रहीं।
ख़ालिदा ज़िया के निधन को बांग्लादेश के एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। उनके जाने से न सिर्फ BNP बल्कि पूरे देश की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है। देश-विदेश के कई राजनीतिक नेताओं और संगठनों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए इसे बांग्लादेश की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
