नई दिल्ली, 08.March.2026 | west Bengal में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के हालिया दौरे को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। मालदा उत्तर लोकसभा क्षेत्र से सांसद तथा भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष खगेन मुर्मु ने रविवार को एक प्रेस वार्ता में राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राष्ट्रपति के साथ राज्य सरकार का व्यवहार संवैधानिक मर्यादा और प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं था। उन्होंने कहा कि यह घटना केवल देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का ही नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान का भी प्रश्न है।
प्रेस वार्ता में खगेन मुर्मु ने कहा कि भारत के राष्ट्रपति देश के 140 करोड़ नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं और संविधान के अनुसार सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन होते हैं। ऐसे में जब राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर आती हैं तो उनका स्वागत करना राज्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु पश्चिम बंगाल पहुंचीं तो बागडोगरा हवाई अड्डे पर न तो मुख्यमंत्री उपस्थित थीं और न ही राज्य सरकार का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद था। उनके अनुसार यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और पश्चिम बंगाल के लिए शर्मनाक है।
खगेन मुर्मु ने बताया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सिलीगुड़ी में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन में भाग लेने के लिए आई थीं, जो किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं था। इसके बावजूद कार्यक्रम के लिए निर्धारित स्थान की अनुमति नहीं दी गई और बार-बार स्थल परिवर्तन करने की स्थिति उत्पन्न हुई, जिसके कारण अंततः कार्यक्रम को बागडोगरा क्षेत्र में आयोजित करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की परिस्थितियाँ न केवल राष्ट्रपति का बल्कि पूरे देश के आदिवासी समाज का अपमान हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब द्रौपदी मुर्मु को देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था, तब पूरे देश का आदिवासी समाज गौरव और सम्मान की भावना से भर गया था। लेकिन पश्चिम बंगाल के दौरे के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों ने उस सम्मान को ठेस पहुंचाने का काम किया है। खगेन मुर्मु ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस सरकार लंबे समय से आदिवासी समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करती रही है और उनके वास्तविक विकास तथा सम्मान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
सांसद खगेन मुर्मु ने राज्य में आदिवासी समाज के साथ हो रही कथित घटनाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि फांसीदेवा में एक गर्भवती महिला पर हमला, आदिवासी महिलाओं पर अत्याचार तथा विभिन्न क्षेत्रों में हो रही उपेक्षा इस बात का संकेत हैं कि राज्य में आदिवासी समाज की सुरक्षा और सम्मान आज भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार आदिवासी, राजबंशी, मतुआ और अन्य समुदायों को केवल चुनाव के समय महत्व देती है, जबकि उनके अधिकारों और विकास के लिए ठोस प्रयास नहीं किए जाते।
उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज के मूल अधिकार हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में उन्हें इन अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। खगेन मुर्मु ने राष्ट्रपति के दौरे से जुड़े घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा इस मामले में रिपोर्ट तलब किया जाना उचित कदम है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनके अनुसार देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का अपमान किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
प्रेस वार्ता में उन्होंने यह भी मांग की कि इस घटना के लिए राज्य की मुख्यमंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल राष्ट्रपति के सम्मान का ही नहीं, बल्कि देश की करोड़ों आदिवासी महिलाओं और पूरे आदिवासी समाज की गरिमा से भी जुड़ा हुआ है।
खगेन मुर्मु ने बताया कि इस घटना के विरोध में पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में आदिवासी समाज पहले ही लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज करा रहा है और लोग सड़कों पर उतरकर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले चुनावों में आदिवासी समाज इस अपमान का जवाब देगा और तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक रूप से अस्वीकार करेगा। प्रेस वार्ता के अंत में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पश्चिम बंगाल के लोग अब परिवर्तन के लिए तैयार हैं और आने वाले समय में भाजपा के नेतृत्व में राज्य में ऐसी सरकार बनेगी जो विकास, सम्मान और संवैधानिक मूल्यों की पुनः स्थापना के लिए कार्य करेगी।
