नई दिल्ली, 01.October.2026। भाजपा सांसद एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) की पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी पर सवाल उठाए। पात्रा ने आरोप लगाया कि पेपर लीक जैसे मुद्दों पर कांग्रेस अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मानदंड अपनाती है।
पात्रा ने कर्नाटक की KPSC पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार होती है, वहां परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी मुखर नजर आते हैं, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद इसी तरह के गंभीर आरोपों पर उनका रवैया सवालों के घेरे में है।
1,400 अभ्यर्थी, 400 पद और 329 चयन
कर्नाटक में वर्ष 2026 में आयोजित पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा में करीब 1,400 अभ्यर्थियों के शामिल होने की बात सामने आई थी। भर्ती प्रक्रिया करीब 400 पदों के लिए थी, जबकि जांच रिपोर्टों के अनुसार 329 अभ्यर्थियों का चयन हुआ। बाद में परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर जांच शुरू की गई।
जांच एजेंसियों के अनुसार, परीक्षा से एक दिन पहले प्रश्नपत्र कथित तौर पर KPSC के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक एवं IAS अधिकारी ज्ञानेंद्र कुमार से कथित बिचौलिए बसवराज कन्नाले तक पहुंचा। ED की जांच के अनुसार, प्रश्नपत्र के साथ उसके उत्तर भी उपलब्ध कराए गए थे और कुछ अभ्यर्थियों से कथित तौर पर लाखों रुपये की रकम लिए जाने की बात सामने आई।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ अभ्यर्थियों को बेंगलुरु के बाहरी इलाके में स्थित एक रिसॉर्ट/विला में ठहराया गया और उन्हें परीक्षा से पहले कथित तौर पर लीक प्रश्नपत्र की तैयारी कराई गई। इसके बाद उन्हें निजी वाहनों के जरिए परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाए जाने की बात जांच में सामने आई।
असफल अभ्यर्थी की शिकायत के बाद सामने आया मामला
यह मामला एक असफल अभ्यर्थी डॉ. एस. मंजुनाथ की शिकायत के बाद सामने आया। जांच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों के परीक्षा प्रदर्शन को लेकर सवाल उठे। उनके पूर्व शैक्षणिक रिकॉर्ड और परीक्षा परिणामों के बीच कथित असामान्य अंतर की भी जांच की गई। जांच में शीर्ष रैंक हासिल करने वाले कुछ अभ्यर्थियों के उत्तरों में समानता मिलने की बात भी सामने आई।
CID और ED की जांच में कथित तौर पर करीब 1.52 करोड़ रुपये के वित्तीय लेन-देन का पता चलने की रिपोर्ट सामने आई है। जांच एजेंसियां इस पूरे मामले में शामिल अभ्यर्थियों, बिचौलियों और अन्य संभावित लोगों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं।
IAS अधिकारी और KPSC अध्यक्ष भी जांच के दायरे में
मामले में तत्कालीन KPSC परीक्षा नियंत्रक ज्ञानेंद्र कुमार गंगवार और कथित बिचौलिए बसवराज कन्नाले की भूमिका जांच के दायरे में आई। KPSC के तत्कालीन अध्यक्ष साहूकर शिवशंकरप्पा से जुड़े परिसरों की तलाशी लिए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई है।
जांच के दौरान वित्तीय लेन-देन और संपत्तियों की भी पड़ताल की गई। रिपोर्टों के अनुसार करीब 22 लाख रुपये मूल्य के एक डायमंड नेकलेस समेत कुछ संपत्तियों और लेन-देन की जांच की गई है। इनका मामले से आपराधिक संबंध है या नहीं, यह जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।
हाईकोर्ट के SIT जांच के आदेश पर भी विवाद
मामले की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने CID जांच से अलग पांच सदस्यीय विशेष जांच दल यानी SIT के माध्यम से जांच के निर्देश दिए। अदालत ने SIT को जांच पूरी करने के लिए समयसीमा भी निर्धारित की।
इसके बाद कर्नाटक सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया। राज्य सरकार की ओर से SIT जांच के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
संबित पात्रा ने राहुल गांधी से पूछा सवाल
संबित पात्रा ने पूरे मामले को राहुल गांधी और कांग्रेस के कथित दोहरे मापदंड से जोड़ते हुए सवाल किया कि यदि पेपर लीक और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दे इतने गंभीर हैं, तो कर्नाटक के KPSC प्रकरण पर राहुल गांधी ने कितनी बार आवाज उठाई?
उन्होंने सवाल किया कि दूसरे राज्यों में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी जिस तरह सरकारों से जवाब मांगते हैं, क्या वही पैमाना कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के मामले में भी लागू होगा?
पात्रा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और राहुल गांधी विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में पेपर लीक के मुद्दे को राजनीतिक रूप से प्रमुखता देते हैं, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस सरकार होने के कारण उनका रवैया अलग दिखाई देता है।
युवाओं के भविष्य और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल
KPSC प्रकरण में जांच और न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है। ऐसे में मामले में अंतिम जिम्मेदारी संबंधित जांच और अदालत के निष्कर्षों के आधार पर ही तय होगी। हालांकि, कथित पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं ने सरकारी भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
सवाल उन हजारों युवाओं के भविष्य का भी है, जो सरकारी नौकरी की परीक्षाओं के लिए वर्षों तक मेहनत करते हैं। ऐसे में पेपर लीक के मामलों में राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार किसी भी दल की हो, युवाओं के हित, निष्पक्ष जांच और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाए।
