कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान ने महाराष्ट्र और राजस्थान में तूफान ला दिया है। लातूर में अभिजीत दिपके पर FIR, जयपुर में आशुतोष रांका पर SC/ST एक्ट समेत मुकदमे ये सब भाजपा शासित राज्यों में हो रहा है। लेकिन सवाल ये है कि तेलंगाना, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में CJP वाले क्यों बिल्कुल चुप हैं? ये राज्य कांग्रेस या आप के हैं। क्या सरकारी स्कूलों की बदहाली सिर्फ भाजपा राज्यों में है? या फिर CJP का असली एजेंडा सिर्फ एक तरफ हंगामा खड़ा करना है?
सिर्फ भाजपा राज्यों में ही क्यों विजिट और विवाद?
15 अगस्त 2026 को अभिजीत दिपके ने अपने गांव हिंगोली (महाराष्ट्र) से अभियान लॉन्च किया। उसके बाद लातूर, राजस्थान के जयपुर, अलवर जैसे जगहों पर टॉप लीडर खुद स्कूलों में घुसे, वीडियो बनाए, शिक्षकों से सवाल किए और विवाद खड़े किए। नतीजा FIR, झड़प, कानूनी केस।
सोशल मीडिया पर सैकड़ों यूजर्स ने एक ही सवाल दोहराया: “क्यों सिर्फ BJP राज्यों में हंगामा? हिमाचल, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना क्यों छूटे?” CJP का जवाब है कि अभियान देशव्यापी है। 1200-1500 स्वयंसेवकों ने कई राज्यों में ऑडिट किए, जिसमें यूपी, एमपी, असम, बिहार, झारखंड भी शामिल हैं। दिपके ने कहा भी था “चाहे कोई भी पार्टी रही हो, स्कूलों की हालत नहीं सुधरी।”
लेकिन जमीनी सच्चाई अलग है। टॉप लीडरशिप की हाई-प्रोफाइल विजिट, वायरल वीडियो और मीडिया कवरेज मुख्य रूप से भाजपा राज्यों तक सीमित है। गैर-भाजपा राज्यों में न तो दिपके-रांका खुद पहुंचे, न ही उसी तीव्रता से विवाद खड़ा किया गया। अगर शिक्षा वाकई गैर-दलीय मुद्दा है, तो समान जोर क्यों नहीं? यह चयनात्मकता CJP की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
झारखंड वाला सबूत: मास्टर नाराज न हो जाएं
झारखंड का छात्र आंदोलन और भी साफ तस्वीर दिखाता है। JPSC-JSSC परीक्षाओं में अनियमितता के खिलाफ रांची में हफ्तों चला आंदोलन। जंतर-मंतर पर जिस आक्रामकता से CJP केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ी, यहां टॉप चेहरे गायब रहे। पार्टी ने स्थानीय टीम भेजी, वीडियो कॉल पर समर्थन जताया और कहा “हम आंदोलन हाईजैक नहीं करना चाहते।”
आलोचक इसे रणनीति बताते हैं। झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस सरकार है। अगर वहां भी उसी अंदाज में घुसपैठ और हंगामा होता, तो उनके कथित समर्थक या “मास्टर्स” नाराज हो सकते थे। आंदोलन सफल रहा, लेकिन CJP की भूमिका जानबूझकर पृष्ठभूमि में रखी गई। यह दूरी बताती है कि पार्टी कहां कितना बोलती है, यह सिर्फ शिक्षा सुधार से नहीं, राजनीतिक सुविधा से तय होता है।
फंडिंग और भविष्य: सवालों के घेरे में
फंडिंग पर भी स्पष्टता नहीं है। दिपके खुद के पैसे और स्वयंसेवकों का सहारा बताते हैं। लेकिन पारदर्शिता की कमी बनी हुई है। जब सिर्फ एक तरफ के राज्यों में हंगामा हो और कानूनी केस लगें, तो सवाल उठना लाजमी है कौन और क्यों इस अभियान को दिशा दे रहा है?
CJP का भविष्य अब शून्य की ओर बढ़ता दिख रहा है। लातूर-जयपुर की FIR, चयनात्मक अभियान के आरोप, झारखंड से दूरी और फंडिंग पर सवाल ये सब पार्टी को जकड़ रहे हैं। शिक्षा सुधार जरूरी है, लेकिन चुनिंदा राज्यों में कानून तोड़कर, विवाद खड़ा करके और राजनीतिक हिसाब-किताब के साथ नहीं। अगर CJP वाकई निष्पक्ष है, तो तेलंगाना, कर्नाटक, हिमाचल और पंजाब के स्कूलों में भी उसी जोश से पहुंचे। वरना “स्कूल ठीक करो” सिर्फ एक तरफा हंगामे का नाम रह जाएगा, जो सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने वाला होगा ।
