
चेतना और पदार्थ का सम्बन्ध मानव–चिन्तन के इतिहास का सर्वाधिक प्राचीन, गूढ़ और विवादास्पद प्रश्न रहा है। यह केवल दर्शन का ही नहीं, बल्कि भौतिकी, जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, तंत्रिकाविज्ञान और आध्यात्मिक परम्पराओं का भी केन्द्रीय विषय रहा है। “मैं कौन हूँ?”, “अनुभव करने वाला कौन है?”, “क्या यह देह–मस्तिष्क की उपज मात्र है अथवा कोई स्वतंत्र तत्त्व?”—इन प्रश्नों ने सभ्यता के प्रत्येक युग में मनीषियों को उद्वेलित किया है। आधुनिक काल में न्यूरोसाइंस इस समस्या को प्रयोगशालाओं में तंत्रिका–तन्तुओं, विद्युत–संकेतों और रासायनिक न्यूरोट्रांसमीटरों के माध्यम से समझने का प्रयास कर रहा है, जबकि भारतीय सनातन परम्परा सहस्राब्दियों पूर्व आत्मा, पुरुष, ब्रह्म और प्रकृति जैसे तत्त्वमीमांसीय सिद्धान्तों के माध्यम से इस प्रश्न को अत्यन्त सूक्ष्म स्तर पर विश्लेषित कर चुकी है। इन दोनों धाराओं का तुलनात्मक एवं समन्वित अध्ययन हमें यह देखने का अवसर देता है कि क्या वे परस्पर विरोधी हैं, या वास्तव में भिन्न–भिन्न स्तरों पर एक ही सत्य को उद्घाटित कर रही हैं।
आधुनिक न्यूरोसाइंस का मूल स्वभाव अनुभवजन्य, परीक्षणात्मक और कार्यकारण–प्रधान है। उसका केन्द्रीय प्रतिपादन यह है कि चेतन अनुभव—दृष्टि, श्रवण, स्मृति, संवेग, आत्मबोध—मस्तिष्क की विशिष्ट तंत्रिकीय संरचनाओं और क्रियात्मक प्रतिरूपों के साथ गहन रूप से सहसम्बद्ध हैं। जब किसी व्यक्ति को संज्ञाहरण (एनेस्थीसिया) दिया जाता है, तो चेतना का लोप–सा हो जाता है; जब मस्तिष्क के विशिष्ट प्रान्तों में आघात पहुँचता है, तो स्मृति, व्यक्तित्व या भाषा–क्षमता परिवर्तित हो जाती है; जब विद्युत–उत्तेजना द्वारा किसी तंत्रिकीय क्षेत्र को सक्रिय किया जाता है, तो दृश्य–भ्रम, स्मृतिचित्र या भावात्मक अनुभूति उत्पन्न हो सकती है। इन सभी तथ्यों से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि चेतना और मस्तिष्क–क्रिया के मध्य अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसे आधुनिक शब्दावली में Neural Correlates of Consciousness कहा जाता है—अर्थात् चेतन अवस्थाओं के साथ सहघटित होने वाली तंत्रिकीय गतिविधियाँ। तथापि, यहीं पर न्यूरोसाइंस की सीमा भी प्रकट हो जाती है, क्योंकि वह यह तो बता सकता है कि कौन–सा न्यूरल नेटवर्क किस प्रकार के अनुभव के साथ सम्बद्ध है, पर यह अभी तक निर्णायक रूप से नहीं समझा पाया कि विद्युत–रासायनिक प्रक्रियाओं से “अनुभव” या “स्वानुभूति” का उद्भव कैसे होता है। यही समस्या दार्शनिक डेविड चैमर्स द्वारा “चेतना की कठिन समस्या” (Hard Problem of Consciousness) कही गई है—कि भौतिक प्रक्रियाओं से गुणात्मक अनुभूति (qualia) का रूपान्तरण कैसे सम्भव होता है।
पश्चिमी दर्शन में इस प्रश्न को लेकर विभिन्न प्रतिपादन विकसित हुए। भौतिकवाद या फिजिकलिज़्म यह मानता है कि समस्त मानसिक अवस्थाएँ अन्ततः भौतिक प्रक्रियाओं में ही रूपान्तरित की जा सकती हैं; चेतना मस्तिष्क की जटिल संगठनात्मक संरचना से उद्भूत एक गुण मात्र है। इसके विपरीत द्वैतवाद, विशेषतः रॅने डिकार्ट का प्रतिपादन, चेतना और पदार्थ को दो स्वतंत्र तत्त्व मानता है, यद्यपि उनके पारस्परिक अन्तःक्रिया–तन्त्र की व्याख्या एक गूढ़ समस्या बनी रहती है। आदर्शवाद (Idealism) चेतना को मूल सत्य और पदार्थ को चेतन अनुभव की ही एक संरचना मानता है, जबकि पैनसाइकोज़्म जैसे आधुनिक सिद्धान्त चेतना को ब्रह्माण्ड का सार्वत्रिक गुण मानने का साहसिक प्रस्ताव रखते हैं। इस प्रकार पश्चिमी परम्परा में भी कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं है, बल्कि यह प्रश्न आज भी खुले विमर्श का विषय बना हुआ है।
भारतीय सनातन दर्शन में, इसके विपरीत, चेतना–पदार्थ सम्बन्ध का विवेचन अत्यन्त प्राचीन, सुविस्तृत और बहुआयामी रूप में उपलब्ध है। उपनिषदिक चिन्तन में ब्रह्म को सच्चिदानन्द—अस्तित्व, चेतना और आनन्द—के रूप में निरूपित किया गया है और आत्मा को समस्त अनुभवों का साक्षी माना गया है। “सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्”—इस वाक्य में सृष्टि–पूर्व अवस्था को भी चेतन तत्त्व से युक्त बताया गया है। अद्वैत वेदान्त इस धारा को और भी तीक्ष्ण बनाते हुए उद्घोष करता है कि ब्रह्म ही परम सत्य है, जगत नाम–रूपात्मक प्रतीति है, और जीव तथा ब्रह्म में तत्त्वतः कोई भेद नहीं। इस दृष्टि से पदार्थ चेतना पर आश्रित है; चेतना किसी भौतिक उपादान की उत्पादिका नहीं, बल्कि स्वयं मूल सत्ता है।
सांख्य दर्शन इस प्रश्न को एक भिन्न पद्धति से सुलझाता है। वह पुरुष और प्रकृति—दो अनादि तत्त्वों को स्वीकार करता है, जिनमें पुरुष शुद्ध चेतन साक्षी है और प्रकृति जड़, त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील। मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियाँ—all प्रकृति के विकार हैं; पर अनुभव करने वाला पुरुष उनसे भिन्न है। यहाँ चेतना न तो पदार्थ से उत्पन्न होती है, न पदार्थ चेतना से; दोनों सह–अस्तित्व में हैं, परन्तु बन्धन और मुक्ति का सम्बन्ध पुरुष की अज्ञानावस्था से जोड़ा जाता है। योग दर्शन इसी सांख्यीय ढाँचे को व्यवहारिक साधना–मार्ग प्रदान करता है और “द्रष्टा स्वरूपेऽवस्थानम्” के सूत्र द्वारा चेतना को चित्त–वृत्तियों से पृथक्, स्वप्रकाश साक्षी के रूप में निरूपित करता है।
विशिष्टाद्वैत वेदान्त चेतना–प्रधान अद्वैत और यथार्थवादी द्वैत के मध्य एक समन्वयकारी मार्ग प्रस्तुत करता है, जिसमें ब्रह्म सगुण–निराकार परम सत्ता है और जीव–जगत् उसके शरीर–सदृश अवयव हैं। द्वैत वेदान्त ईश्वर, जीव और प्रकृति को पृथक्–पृथक् स्वीकार करता है, किन्तु चेतना को जीव और ईश्वर का स्वभाव तथा प्रकृति को जड़ मानता है। न्याय–वैशेषिक दर्शन आत्मा को चेतन द्रव्य मानते हुए शरीर–मस्तिष्क को उसका उपकरण मानते हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि चेतना की अभिव्यक्ति भौतिक माध्यमों पर निर्भर हो सकती है, पर उसका मूल स्वरूप उनसे परे है। इस प्रकार सनातन परम्परा की विविध शाखाओं में मतभेद होते हुए भी एक साझा प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है—कि चेतना को मात्र भौतिक उत्पाद मानने की प्रवृत्ति से वे सभी दूर हैं।
जब हम आधुनिक न्यूरोसाइंस और सनातन दर्शन को आमने–सामने रखते हैं, तो प्रथम दृष्टि में यह प्रतीत हो सकता है कि दोनों परस्पर विरोधी हैं—एक चेतना को मस्तिष्क–क्रिया से जोड़ता है, दूसरा उसे देह–मन से परे स्वतंत्र या मूल तत्त्व मानता है। किन्तु गहन विवेचन करने पर यह विरोध इतना सरल नहीं रह जाता। न्यूरोसाइंस मुख्यतः यह प्रतिपादित करता है कि चेतना की अभिव्यक्ति मस्तिष्कीय अवस्थाओं पर निर्भर है; वह यह नहीं कहता कि चेतना का अस्तित्व तत्त्वमीमांसीय रूप से केवल वहीं से उत्पन्न होता है—यह निष्कर्ष दार्शनिक व्याख्या का विषय बन जाता है। दूसरी ओर सनातन दर्शन यह कह सकता है कि आत्मा या चेतना देह–मन में व्यक्त होने के लिए किसी माध्यम की अपेक्षा रखती है; जैसे प्रकाश को प्रतिबिम्बित होने के लिए दर्पण की आवश्यकता होती है, वैसे ही चेतना के प्राकट्य के लिए तंत्रिकीय–संरचना एक उपकरण हो सकती है। इस रूपक के द्वारा दोनों दृष्टियों के बीच एक सम्भावित संगति उभरती है—विज्ञान माध्यम का अध्ययन करता है, दर्शन मूल सत्ता पर प्रश्न करता है।
विशेष रूप से ध्यान और योग–साधना के क्षेत्र में यह संगति और भी स्पष्ट हो जाती है। आधुनिक अनुसंधान यह दर्शाते हैं कि नियमित ध्यान–अभ्यास से मस्तिष्क में संरचनात्मक और कार्यात्मक परिवर्तन होते हैं—ध्यान–सम्बन्धी क्षेत्रों की सक्रियता बढ़ती है, तनाव–संचालित नेटवर्क शिथिल होते हैं, और तंत्रिका–लचीलापन (neuroplasticity) सुदृढ़ होता है। योग दर्शन इसे चित्त–वृत्तियों के निरोध द्वारा द्रष्टा–स्वरूप की अनुभूति के रूप में व्याख्यायित करता है। यहाँ विज्ञान “कैसे” का उत्तर खोजता है—कौन–से न्यूरल तंत्र बदलते हैं—जबकि दर्शन “क्या” पर केन्द्रित है—चेतना के स्वभाव का प्रत्यक्षानुभव। इस प्रकार दोनों दृष्टियाँ परस्पर पूरक बन सकती हैं।
अन्ततः यह स्पष्ट होता है कि चेतना–पदार्थ समस्या बहुस्तरीय है। एक स्तर पर वह जैविक और तंत्रिकीय है, जहाँ न्यूरोसाइंस अपने उपकरणों से मापन और परीक्षण करता है; दूसरे स्तर पर वह तत्त्वमीमांसीय और आध्यात्मिक है, जहाँ दर्शन अस्तित्व के मूल स्वरूप पर प्रश्न करता है। जब हम इन दोनों स्तरों को गड्ड–मड्ड कर देते हैं, तब भ्रम उत्पन्न होता है—यदि विज्ञान से तत्त्वमीमांसीय निष्कर्ष निकाले जाएँ, या दर्शन से प्रयोगात्मक दावे किए जाएँ। किन्तु यदि उन्हें उनके अपने–अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित किया जाए, तो वे एक ही व्यापक सत्य के दो भिन्न आयाम प्रतीत होते हैं।
इस समग्र विवेचन का निष्कर्ष किसी सरल द्वन्द्वात्मक उत्तर में नहीं समाता—कि चेतना ही सब कुछ है या पदार्थ ही सब कुछ। आधुनिक विज्ञान हमें यह सिखाता है कि चेतना की अभिव्यक्ति भौतिक संरचनाओं से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है; सनातन दर्शन यह उद्घाटित करता है कि चेतना को मात्र उन संरचनाओं में सीमित कर देना अस्तित्व के गहनतम आयामों की उपेक्षा होगी। सम्भवतः एक व्यापक, समन्वित दृष्टिकोण यही है कि चेतना और पदार्थ को विरोधी ध्रुवों की भाँति नहीं, बल्कि एक ही यथार्थ के भिन्न–भिन्न प्रतिफलनों के रूप में देखा जाए—जहाँ पदार्थ चेतना के प्रकाश में अनुभूत होता है और चेतना पदार्थ के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। यही वह बिन्दु है जहाँ आधुनिक प्रयोगशालाओं की खोजें और प्राचीन आश्रमों की अनुभूतियाँ एक दूसरे से संवाद कर सकती हैं, और मानव–बुद्धि उस रहस्य की ओर एक और सूक्ष्म, एक और विनम्र पग बढ़ा सकती है जिसे हम “स्वयं” कहते हैं।
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