
इक्कीसवीं सदी को यदि समुद्री शताब्दी कहा जाए तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। विश्व व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत भाग समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है, और ऊर्जा आपूर्ति के प्रमुख रास्ते भी समुद्र से होकर ही संचालित होते हैं। ऐसे में समुद्री क्षेत्र केवल व्यापारिक मार्ग नहीं रहे; वे वैश्विक शक्ति संतुलन, सामरिक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक प्रभाव के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। विशेष रूप से हिन्द महासागर आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है, क्योंकि यह एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्थित वह रणनीतिक क्षेत्र है जहाँ से विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक जीवनरेखा गुजरती है। इस समुद्री क्षेत्र में घटने वाली किसी भी घटना का प्रभाव केवल स्थानीय नहीं होता, बल्कि उसका असर व्यापक वैश्विक व्यवस्था तक पहुँच सकता है।
हाल के वर्षों में हिन्द महासागर में कई ऐसी घटनाएँ और चर्चाएँ सामने आई हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि समुद्र अब केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि राजनीति, रणनीति और कूटनीति का जटिल संगम बन चुका है। किसी विदेशी युद्धपोत से जुड़ी घटना या किसी सैन्य कार्रवाई की खबर सामने आते ही यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि उस क्षेत्र में सक्रिय क्षेत्रीय शक्तियों की जिम्मेदारी क्या है, और क्या वे उस घटना के प्रति जवाबदेह मानी जा सकती हैं। इस संदर्भ में भारत का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है, क्योंकि पिछले दो दशकों में भारत को हिन्द महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण समुद्री शक्ति और सुरक्षा प्रदाता के रूप में देखा जाने लगा है।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार किसी भी देश की समुद्री संप्रभुता का दायरा क्या होता है। इस विषय का मूल आधार United Nations Convention on the Law of the Sea है, जिसे आधुनिक समुद्री कानून का संविधान भी कहा जाता है। इस संधि के अनुसार किसी भी देश की तटरेखा से 12 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र उसका टेरिटोरियल सी या संप्रभु समुद्री क्षेत्र माना जाता है। इस सीमा के भीतर उस देश के कानून और अधिकार पूर्ण रूप से लागू होते हैं। इसके आगे 24 नॉटिकल मील तक कॉन्टिग्युअस ज़ोन होता है, जहाँ देश कुछ विशेष प्रकार की निगरानी और नियंत्रण कर सकता है। 200 नॉटिकल मील तक का क्षेत्र विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ कहलाता है, जहाँ उस देश को समुद्री संसाधनों के दोहन का अधिकार प्राप्त होता है।
इस व्यवस्था के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी भी देश की प्रत्यक्ष समुद्री संप्रभुता 12 नॉटिकल मील तक ही सीमित होती है। परंतु आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में समुद्री सुरक्षा केवल संप्रभुता की परिभाषा से संचालित नहीं होती। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, समुद्री डकैती की रोकथाम, आतंकवाद विरोधी निगरानी, मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे अनेक कार्य ऐसे हैं जिनके लिए क्षेत्रीय शक्तियाँ व्यापक जिम्मेदारी निभाती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की भूमिका महत्वपूर्ण बन जाती है।
पिछले दो दशकों में भारत की समुद्री नीति में एक स्पष्ट परिवर्तन देखा गया है। भारत ने स्वयं को केवल तटीय सुरक्षा तक सीमित रखने के बजाय पूरे हिन्द महासागर क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की है। इसी संदर्भ में भारत को अक्सर हिन्द महासागर क्षेत्र में “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” कहा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत इस पूरे क्षेत्र का औपचारिक प्रहरी है, बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि भारत अपनी समुद्री क्षमता, नौसैनिक उपस्थिति और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता को बनाए रखने में अग्रणी भूमिका निभाता है।
इस भूमिका को समझने के लिए भारत की नौसेना की संरचना और उसकी रणनीतिक सोच को देखना आवश्यक है। Indian Navy केवल युद्धकालीन शक्ति नहीं है; वह शांति काल में भी समुद्री निगरानी, मानवीय सहायता, आपदा राहत और समुद्री सहयोग के कार्यों में सक्रिय रहती है। 2004 की सुनामी के बाद भारत ने जिस प्रकार त्वरित राहत अभियान चलाया, उसने इस बात को प्रमाणित किया कि भारतीय नौसेना केवल सैन्य शक्ति नहीं बल्कि मानवीय सहायता की भी एक महत्वपूर्ण संस्था है।
हिन्द महासागर में भारत की समुद्री रणनीति को एक व्यापक दृष्टिकोण के अंतर्गत समझा जाता है जिसे “सागर” यानी Security and Growth for All in the Region की नीति के रूप में जाना जाता है। इस दृष्टिकोण का मूल विचार यह है कि हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि केवल एक देश की जिम्मेदारी नहीं हो सकती; इसके लिए सभी देशों के बीच सहयोग और विश्वास आवश्यक है। इस नीति के अंतर्गत भारत छोटे द्वीपीय देशों के साथ सुरक्षा सहयोग, समुद्री निगरानी और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देता है।
उदाहरण के लिए Maldives, Mauritius और Seychelles जैसे देशों के साथ भारत का घनिष्ठ समुद्री सहयोग है। इन देशों के लिए भारत केवल एक पड़ोसी राष्ट्र नहीं बल्कि सुरक्षा साझेदार भी है। समुद्री निगरानी, तटरक्षक प्रशिक्षण और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारत इन देशों की सहायता करता रहा है। यह सहयोग केवल सैन्य संबंध नहीं बल्कि क्षेत्रीय विश्वास का प्रतीक भी है।
इसी प्रकार Colombo Security Conclave एक ऐसा मंच है जिसमें India, Sri Lanka और मालदीव जैसे देश समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग और साइबर सुरक्षा जैसे विषयों पर मिलकर काम करते हैं। यह मंच इस बात का प्रमाण है कि हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा एक साझा जिम्मेदारी है।
भारत ने समुद्री निगरानी और सूचना साझेदारी के लिए कई तकनीकी प्रणालियाँ भी विकसित की हैं। इनमें Indian Ship Position and Information Reporting System (INDSPIRES) जैसी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। इस प्रणाली के माध्यम से हिन्द महासागर क्षेत्र में चलने वाले जहाज अपनी स्थिति और गतिविधियों की जानकारी साझा करते हैं, जिससे संभावित खतरे या संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना आसान हो जाता है। यह प्रणाली समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में भारत की क्षमता और तकनीकी दक्षता को दर्शाती है।
हिन्द महासागर में भारत की सक्रियता केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। भारत समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास और समुद्री सम्मेलनों का आयोजन भी करता है, जिनका उद्देश्य विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ाना होता है। उदाहरण के लिए Exercise MILAN एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास है जिसमें एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के कई देश भाग लेते हैं। इसी प्रकार International Fleet Review 2016 जैसे आयोजनों में विश्व की नौसेनाएँ एक साथ उपस्थित होकर समुद्री सहयोग का संदेश देती हैं।
इन आयोजनों का महत्व केवल सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं है। यह समुद्री कूटनीति का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। जब कोई देश अपने युद्धपोतों को ऐसे आयोजनों में भेजता है, तो वह एक प्रकार से उस मेजबान देश के साथ विश्वास और सहयोग का संकेत देता है। इसलिए यदि ऐसे किसी कार्यक्रम से जुड़े जहाज के साथ कोई विवादास्पद घटना घटती है, तो उसका कूटनीतिक प्रभाव भी व्यापक हो सकता है।
आज हिन्द महासागर की भू-राजनीति को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि इस क्षेत्र में वैश्विक शक्तियों की भूमिका किस प्रकार बढ़ रही है। United States, China और यूरोपीय शक्तियाँ भी इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ा रही हैं। चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति और अमेरिका की इंडो-पैसिफिक नीति इस बात का संकेत हैं कि हिन्द महासागर अब वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है।
भारत के लिए यह स्थिति एक अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि भारत अपनी भौगोलिक स्थिति और समुद्री क्षमता के कारण इस क्षेत्र में एक स्वाभाविक नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। चुनौती इसलिए कि उसे वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और भारत किसी अनावश्यक संघर्ष में न उलझे।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि समुद्री घटनाएँ कभी-कभी बड़े युद्धों का कारण बन जाती हैं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन पनडुब्बियों द्वारा व्यापारी जहाजों को निशाना बनाने की घटनाओं ने अंततः United States को 1917 में युद्ध में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था। समुद्र में होने वाली घटनाएँ अक्सर केवल सैन्य नहीं बल्कि राजनीतिक और आर्थिक परिणाम भी उत्पन्न करती हैं।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने समुद्री हितों की रक्षा करते हुए संतुलित और विवेकपूर्ण नीति अपनाए। भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी भी वैश्विक शक्ति के प्रभाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है। हिन्द महासागर की जटिल परिस्थितियों में यही नीति भारत के लिए सबसे उपयुक्त प्रतीत होती है।
भारत को अपनी समुद्री निगरानी प्रणाली, नौसैनिक क्षमता और क्षेत्रीय सहयोग को लगातार मजबूत करना होगा। साथ ही उसे कूटनीतिक स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि हिन्द महासागर संघर्ष का क्षेत्र न बने, बल्कि सहयोग और साझा विकास का क्षेत्र बना रहे।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि समुद्र केवल युद्धपोतों और सैन्य शक्ति का विषय नहीं है। यह मानव सभ्यता की साझा धरोहर है, जहाँ से व्यापार, संस्कृति और संपर्क के मार्ग निकलते हैं। यदि समुद्र संघर्ष का मैदान बन जाता है तो उसका प्रभाव केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहेगा; वह वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव समाज को भी प्रभावित करेगा।
भारत के सामने आज यही ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी सामरिक शक्ति, कूटनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से हिन्द महासागर को शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि का क्षेत्र बनाए। यही वह मार्ग है जो भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है और यही वह दृष्टि है जो आने वाले समय में विश्व व्यवस्था को अधिक संतुलित और सुरक्षित बना सकती है।
