क्या भारत में आरक्षण सामाजिक न्याय का माध्यम है या फिर कहीं-कहीं यह संवैधानिक बहस का विषय भी बन चुका है?
क्या किसी राज्य द्वारा दिया गया आरक्षण 16 वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित रह सकता है?और सबसे बड़ा प्रश्न यदि भविष्य में फैसला उल्टा आता है, तो अब तक दिए गए लाभों का क्या होगा?
मैं आज आप सभी के सामने एक ऐसे ही संवेदनशील लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय को रख रहा हूँ :आंध्र प्रदेश में वर्ष 2004 में लागू किया गया मुस्लिम आरक्षण।
आंध्र प्रदेश मुस्लिम आरक्षण: शुरुआत कैसे हुई?
वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी सरकार ने मुसलमानों को BC-E श्रेणी में शामिल करते हुए 5% आरक्षण का प्रावधान किया।भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत आरक्षण को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था माना गया है।
अधिकांश राजनेता, चिंतक और सामाजिक संगठन इस बात से सहमत हैं कि सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण आवश्यक है।लेकिन प्रश्न तब उठता है जब किसी आरक्षण की संवैधानिक वैधता ही न्यायालय में लंबित हो।
हाई कोर्ट की आपत्ति और कानूनी संघर्ष
इस निर्णय को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई — और कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया।
इसके बाद:
सरकार अध्यादेश लाई
विधानसभा से कानून पारित कराया
फिर भी न्यायिक जांच में टिक नहीं पाया
क्योंकि 5% आरक्षण राज्य की 50% सीमा से ऊपर जा रहा था
जो सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) केस में निर्धारित की थी।इसी कारण इसे घटाकर 4% कर दिया गया।
धर्म आधारित या सामाजिक पिछड़ापन?
यहीं से संवैधानिक बहस शुरू होती है:
क्या यह आरक्षण सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आधारित था?
या धर्म आधारित वर्गीकरण था?वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने Prima Facie टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रावधान प्रथम दृष्टया धार्मिक आधार पर प्रतीत होता है और इस पर रोक लगा दी गई।
2010: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
फरवरी 2010 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज कर दिया।राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची जहाँ तर्क दिया गया:
यह आरक्षण पूरे मुस्लिम समुदाय को नहीं, बल्कि 15 सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े उप-समुदायों को दिया गया है।
25 मार्च 2010 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अंतरिम आदेश दिया:
अंतिम वैधता तय नहीं हुई
पूर्ण रोक भी नहीं लगी
4% आरक्षण जारी रखने की अनुमति दे दी गई
16 वर्षों से लंबित अंतिम फैसला
आज 16 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन संविधान पीठ द्वारा अंतिम निर्णय अब तक लंबित है।यहीं से कई बड़े संवैधानिक प्रश्न खड़े होते हैं:
यदि आरक्षण असंवैधानिक घोषित हुआ तो लाभों का क्या होगा?
नियुक्तियाँ, प्रवेश, पदोन्नति सबकी वैधता कैसे तय होगी?
क्या 4% आरक्षण OBC हिस्से से समायोजित हुआ?
यदि हाँ तो OBC अवसरों पर क्या प्रभाव पड़ा?
संवैधानिक स्पष्टता की आवश्यकता
मेरा उद्देश्य किसी समुदाय के अधिकारों का विरोध नहीं
बल्कि संवैधानिक स्पष्टता की माँग उठाना है।
आज आवश्यकता है कि सुप्रीम कोर्ट में 15-20 वर्षों से लंबित संवैधानिक महत्व के मामलों के त्वरित निपटान हेतु समयबद्ध रणनीति बने।
ताकि:
सामाजिक न्याय सुरक्षित रहे
संविधान की मर्यादा भी बनी रहे
यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही न्याय की वास्तविक कसौटी।
