जब राष्ट्रबोध आग बन जाए और वामपंथी अंधकार राख में बदल जाए
नई दिल्ली , 25 दिसंबर 2025 | यह बिलकुल साधारण सा आलेख है, क्योंकि यह वैचारिक युद्ध की उद्घोषणा है। यह उन सभी वामपंथी, छद्म-प्रगतिशील और राष्ट्रविरोधी शक्तियों के लिए खुली चुनौती है, जो सौ वर्षों से यह झूठ फैलाते आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत को कोई लेखक, कोई बुद्धिजीवी, कोई विचारक नहीं दिया। यह वही लोग हैं जिनकी पूरी बौद्धिकता विदेशी किताबों की फुटनोट, विश्वविद्यालयी अनुदानों और सत्ता-समर्थित पुरस्कारों पर टिकी हुई है। जब संघ अपनी शताब्दी पूर्ण कर चूका है और भारत अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती मना रहा है, तब इन लोगों की बौखलाहट स्वाभाविक है क्योंकि आज इतिहास उनके झूठ को सार्वजनिक रूप से नंगा कर रहा है।
संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इसलिए नहीं की थी कि दिल्ली, जेएनयू या लंदन के सेमिनारों में भारत को कोसा जाए। संघ का जन्म इसलिए हुआ था कि गुलामी की मानसिकता में जकड़े समाज को यह याद दिलाया जाए कि वह एक राष्ट्र है, कोई प्रयोगशाला नहीं। सौ वर्षों की इस यात्रा में संघ ने कभी यह नहीं पूछा कि उसे कितने पुरस्कार मिले, बल्कि यह पूछा कि देश को कितने चरित्रवान नागरिक मिले। यही अंतर है संघ और वामपंथ के बीच एक राष्ट्र गढ़ता है, दूसरा राष्ट्र को गाली देकर स्वयं को बुद्धिजीवी साबित करता है।
वामपंथी लेखक की परिभाषा वही है जो कॉफी हाउस में बैठकर भारत को पिछड़ा, हिन्दू संस्कृति को बर्बर और राष्ट्रभाव को फासीवाद घोषित करे। इनके लिए लेखक वही है जो अपने ही समाज से घृणा करे, अपने ही देवताओं का उपहास उड़ाए और विदेशी विचारों को आयात कर भारतीय चेतना पर थोप दे। संघ ने ऐसे लेखक कभी पैदा नहीं किए और यही बात इनकी पीड़ा है। संघ का लेखक वह है जो अपने जीवन, विचार और कर्म में एकरूपता रखता है। वह मंच पर खड़ा होकर भारत को कोसता नहीं, बल्कि चुपचाप भारत को मज़बूत करता है।
अटल बिहारी वाजपेयी इस बात का सबसे करारा तमाचा हैं। एक कवि, एक लेखक, एक विचारक और वही व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बनकर वैश्विक दबावों के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया। पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद जब पूरा पश्चिम भारत पर प्रतिबंध थोप रहा था, तब अटल जी ने न कविता लिखकर भागने का रास्ता चुना, न माफी मांगकर पुरस्कार पाने की राजनीति की। उन्होंने कहा भारत अपनी सुरक्षा खुद तय करेगा। यही वह क्षण था जब संघ का संस्कार सत्ता में बोल रहा था और वामपंथी बुद्धिजीवी अपने विदेशी आकाओं को सफाई दे रहे थे।
वामपंथ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी तथाकथित बौद्धिकता जीवन में झूठी होती है। युवावस्था में यह क्रांति का नारा लगाती है, धर्म और राष्ट्र का मज़ाक उड़ाती है, और बुढ़ापे में वही लोग शांति, पूजा और संस्कार की बातें करने लगते हैं। इसके विपरीत, संघ का स्वयंसेवक चाहे वह लेखक हो, शिक्षक हो या सैनिक बाल्यकाल से लेकर अंतिम श्वास तक एक ही विचार में स्थिर रहता है। उसके लिए “भारत माता की जय” कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है।
जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन देते हैं, तब वामपंथी कांप उठते हैं, क्योंकि यह दर्शन न तो वर्ग-संघर्ष की बात करता है और न ही समाज को तोड़ने की साजिश। यह दर्शन मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ता है। जब स्वामी विवेकानंद युवाओं को उठो और जागो का संदेश देते हैं, तब वामपंथी इसे ‘राष्ट्रवादी उन्माद’ कहकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि इन्हें भय है जागा हुआ भारत इनके झूठ को स्वीकार नहीं करेगा।
वामपंथी लेखक नाम पूछते हैं, ब्रांड ढूंढते हैं, बेस्टसेलर की सूची दिखाते हैं। संघ का लेखक नाम नहीं मांगता, वह संस्कार छोड़ता है। उनकी किताबें भले ही विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी में न मिलें, लेकिन उनके विचार गांवों, कस्बों, स्कूलों और घरों में जीवित मिलते हैं। उनकी स्याही विदेशी अनुदान से नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी से बनी होती है। यही कारण है कि वामपंथ की किताबें समय के साथ मर जाती हैं, लेकिन संघ की दृष्टि हर पीढ़ी में नए रूप में जन्म लेती है।
आज संघ की शताब्दी और अटल 101 यह ऐलान है कि भारत अब माफी मांगने वाला राष्ट्र नहीं है। यह उन सबके लिए चेतावनी है जो भारत को तोड़कर, धर्म को गाली देकर और संस्कृति को अपमानित करके स्वयं को बुद्धिजीवी कहते हैं। संघ लेखक नहीं गढ़ता संघ राष्ट्रनिर्माता गढ़ता है। और यही बात वामपंथियों की नींद उड़ाए हुए है।
वामपंथी धारा बार-बार यह भूल करती है कि वह लेखक को नाम और ब्रांड से पहचानती है, जबकि संघ विचार और प्रभाव से। उनके लेखक विश्वविद्यालयों के शोध-विषय बनते हैं, जबकि संघ के लेखक समाज के संस्कार बनते हैं। उनकी कविताएँ कृत्रिम वर्ग-चेतना जगाती हैं, जबकि संघ की कविताएँ और विचार राष्ट्र-चेतना को जाग्रत करते हैं। यही कारण है कि संघ के लेखक समय की धूल में नहीं खोते, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति में जीवित रहते हैं।
आज संघ की शताब्दी और अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती यह स्पष्ट संदेश देती है कि भारत की वैचारिक धारा किसी आयातित सिद्धांत से नहीं, बल्कि अपनी ही सभ्यता से पोषित होती है। संघ लेखक नहीं गढ़ता, वह ऐसे मनुष्य गढ़ता है जो राष्ट्र का भविष्य लिखते हैं। उनकी कलम दिखाई दे या न दे, उनका लेखन भारत को मजबूत करता है। इतिहास गवाह है कि जिनकी दृष्टि स्वदेशी होती है, जिनकी जड़ें अपनी मिट्टी में होती हैं, उनकी विचारधारा अमर होती है।
अंततः, जो लोग आज भी यह कहते हैं कि संघ ने कोई लेखक नहीं दिया, उन्हें यह समझना चाहिए कि संघ नाम नहीं, दृष्टि देता है। और इतिहास में नाम भले बदल जाएँ, पर दृष्टियाँ ही युग बनाती हैं। संघ शताब्दी और अटल 101 उसी युग-निर्माण की घोषणा है जहाँ विचार राष्ट्र बनते हैं और राष्ट्र विचारों से अमर होता है।
अंत में मै चन्दन झा सिर्फ तुमलोगों से यह कहना चाहूँगा की तुम अपने लेनिन, मार्क्स और माओ की किताबें उठाए घूमते रहो। संघ विचार बोता रहेगा। जब इतिहास फिर लिखा जाएगा, तब तुम्हारे नाम फुटनोट में भी जगह पाने के लिए तरसेंगे, लेकिन संघ की दृष्टि, अटल की कविता और राष्ट्रबोध की यह परंपरा तब भी भारत की रीढ़ बनकर खड़ी रहेगी। यही इस आलेख का उद्घोष है विचार जब राष्ट्र बन जाते हैं, तब वामपंथ की हर साजिश अपने आप दम तोड़ देती है।

