सनातन परम्परा में शब्द, ध्वनि और लय को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय चेतना के मूल तत्त्वों के रूप में स्वीकार किया गया है। भारतीय चिन्तन में वाङ्मय, छन्द और संगीत—तीनों एक ही नाद-तत्त्व से उद्भूत माने जाते हैं। नाद को ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति कहा गया है और इसी नाद से शब्द, शब्द से अर्थ और अर्थ से भाव की उत्पत्ति मानी गई है। इस दृष्टि से छन्द और संगीत किसी अलग-अलग कलात्मक अनुशासन के रूप में नहीं, बल्कि एक ही सनातन धारा के दो प्रवाह हैं, जो समय के साथ भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त होते रहे हैं।
वेदों की रचना ही इस तथ्य का प्रथम और सबसे प्रामाणिक प्रमाण है। ऋग्वेद के मन्त्र मूलतः छन्दबद्ध हैं और उनका उच्चारण एक निश्चित लयात्मक अनुशासन के अंतर्गत होता है। सामवेद तो पूर्णतः गायन परम्परा पर आधारित है, जहाँ मन्त्रों को स्वरों में बाँधकर प्रस्तुत किया गया। यह कहना अधिक उचित होगा कि सामवेद भारतीय संगीत का आदि-ग्रन्थ है। यहाँ छन्द, स्वर और ताल का जो समन्वय दिखाई देता है, वही आगे चलकर भारतीय संगीत की आत्मा बना। वैदिक ऋषियों ने यह भली-भाँति समझ लिया था कि शब्द तभी प्रभावी होता है जब वह लय से संयुक्त हो, और लय तभी जीवंत होती है जब उसमें भाव और अर्थ निहित हों।
छन्द का मूल उद्देश्य केवल मात्राओं की गणना नहीं है, बल्कि शब्दों के प्रवाह, विराम और उच्चारण को इस प्रकार संयोजित करना है कि वह श्रोता के मन और चेतना पर गहरा प्रभाव डाले। गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती जैसे वैदिक छन्दों में यह गुण स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्रत्येक छन्द का अपना एक आन्तरिक संगीत होता है, जो पाठ के समय स्वतः प्रकट होता है। यही आन्तरिक संगीत आगे चलकर ताल और लय की वैज्ञानिक अवधारणा में विकसित हुआ। इस प्रकार छन्द को भारतीय संगीत का बौद्धिक और दार्शनिक आधार कहना किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं है।
संस्कृत काव्य परम्परा में छन्दों का विकास अत्यंत सूक्ष्म और परिष्कृत रूप में हुआ। कालिदास, माघ, भारवि, भवभूति जैसे महाकवियों ने छन्द को केवल तकनीकी अनुशासन न मानकर उसे भाव-प्रकाशन का साधन बनाया। मंदाक्रान्ता की धीमी, गम्भीर गति विरह और करुणा को व्यक्त करती है, जबकि शार्दूलविक्रीडित की तेज और ओजपूर्ण लय वीर रस को प्रखर बनाती है। यह संयोग नहीं है कि इन छन्दों को पढ़ते समय पाठक के मन में एक विशिष्ट संगीतात्मक अनुभूति उत्पन्न होती है। यह अनुभूति ही छन्द और संगीत के अन्तर्सम्बन्ध का मूल आधार है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग और ताल की व्यवस्था भी इसी छन्दीय चेतना से विकसित हुई प्रतीत होती है। जिस प्रकार छन्द में गुरु और लघु का संतुलन आवश्यक होता है, उसी प्रकार ताल में मात्रा और विभाग का संतुलन अनिवार्य है। तीनताल, एकताल, झपताल जैसी ताल-प्रणालियाँ वस्तुतः छन्दों की मात्रिक व्यवस्था का ही संगीतात्मक रूप हैं। राग की समय-सिद्धान्त पर आधारित प्रस्तुति भी वैदिक काल के ऋतु और काल-चिन्तन से जुड़ी हुई है। इस प्रकार संगीत की संरचना में छन्द का प्रभाव केवल काव्यात्मक नहीं, बल्कि दार्शनिक और वैज्ञानिक भी है।
भक्ति आन्दोलन के साथ छन्द और संगीत का सम्बन्ध और अधिक सघन हो गया। इस काल में काव्य का उद्देश्य केवल सौन्दर्य या विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनसामान्य तक भाव और भक्ति का संचार करना था। तुलसीदास की चौपाइयाँ, सूरदास के पद, मीरा के भजन—ये सभी छन्दबद्ध रचनाएँ हैं, जिन्हें गाए बिना उनकी पूर्ण अनुभूति संभव नहीं। यहाँ छन्द लोकभाषा और लोकधुन के साथ मिलकर एक ऐसी परम्परा का निर्माण करता है, जो आज भी भारतीय समाज में जीवित है। यह स्पष्ट करता है कि छन्द केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने लोक-संस्कृति में भी गहरी जड़ें जमाईं।
लोक-संगीत वास्तव में छन्द और संगीत के इस सनातन सम्बन्ध का सबसे सजीव प्रमाण है। लोकगीतों में भले ही शास्त्रीय नियमों का स्पष्ट उल्लेख न हो, किंतु उनमें एक स्वाभाविक छन्दीय अनुशासन अवश्य होता है। सोहर, कजरी, चैती, बिरहा, आल्हा—इन सभी में लय और मात्राओं का संतुलन सहज रूप से विद्यमान रहता है। यह इस बात का संकेत है कि छन्द भारतीय चेतना में केवल विद्वानों का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी संगीत के माध्यम से प्रवाहित होती रही है।
आधुनिक भारतीय संगीत, विशेषकर फ़िल्म संगीत, को यदि गहराई से देखा जाए, तो उसमें भी छन्दीय संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गीतों के मुखड़े और अन्तरों की रचना, तुकान्त, पुनरावृत्ति और ताल—ये सभी छन्द के आधुनिक रूप हैं। भले ही आज गीतकार मुक्तछन्द या पश्चिमी प्रभावों का प्रयोग करे, किंतु एक आन्तरिक लय के बिना गीत प्रभावी नहीं हो सकता। यह आन्तरिक लय ही सनातन छन्द-परम्परा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। यहाँ तक कि रैप या समकालीन प्रयोगधर्मी संगीत भी किसी न किसी लयात्मक ढाँचे का अनुसरण करता है।
यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है कि छन्द और संगीत का सम्बन्ध केवल तकनीकी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है। भारतीय दर्शन में नादयोग की अवधारणा इसी सम्बन्ध को रेखांकित करती है। माना जाता है कि शुद्ध ध्वनि और लय के माध्यम से मन को एकाग्र किया जा सकता है और चेतना के उच्च स्तर तक पहुँचा जा सकता है। मंत्रोच्चार, कीर्तन और भजन—ये सभी इसी सिद्धान्त पर आधारित हैं। यहाँ छन्द साधना का अनुशासन प्रदान करता है और संगीत साधना को रसात्मक बनाता है।
समकालीन समय में, जब संगीत तेजी से व्यावसायिक और उपभोग-केंद्रित होता जा रहा है, तब इस सनातन अन्तर्सम्बन्ध को समझना और भी आवश्यक हो जाता है। यदि संगीत को केवल मनोरंजन के रूप में देखा जाएगा और छन्द को केवल साहित्य की तकनीक समझकर अलग कर दिया जाएगा, तो दोनों की आत्मा क्षीण होती जाएगी। भारतीय परम्परा हमें यह सिखाती है कि कला का उद्देश्य केवल आनंद नहीं, बल्कि चेतना का उत्थान भी है। छन्द और संगीत का संयुक्त प्रभाव ही इस उद्देश्य को पूर्ण कर सकता है।
शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी इस दृष्टि से पुनर्विचार की आवश्यकता है। संगीत के विद्यार्थियों को छन्द की मूलभूत समझ और साहित्य के विद्यार्थियों को संगीतात्मक संवेदना से परिचित कराना अत्यंत आवश्यक है। जब तक यह समन्वय स्थापित नहीं होगा, तब तक भारतीय कला-परम्परा का समग्र बोध संभव नहीं है। छन्द और संगीत का सम्बन्ध केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है।
अन्ततः यह कहा जा सकता है कि सनातन वाङ्मय में छन्द और वर्तमान भारतीय संगीत के मध्य का सम्बन्ध एक जीवंत, गतिशील और सतत प्रवाह है। समय के साथ रूप, भाषा और शैली बदलती रही है, किंतु मूल चेतना वही बनी रही है। छन्द ने संगीत को अनुशासन दिया और संगीत ने छन्द को प्राणवत्ता प्रदान की। यही अद्वैत सम्बन्ध भारतीय संस्कृति की विशिष्टता है—एक ऐसी परम्परा जो परिवर्तन को स्वीकार करती है, किंतु अपने मूल नाद-तत्त्व से कभी विच्छिन्न नहीं होती।
**संकलन, लेखन एवं सम्पादन**
डॉ प्रसन्न कुमार ठाकुर

