भुवनेश्वर/नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026 : भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत के संरक्षण, अनुसंधान और समावेशी विकास को नई दिशा देने के उद्देश्य से जनजातीय कार्य मंत्रालय 7 और 8 जुलाई 2026 को ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में ‘जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सुदृढ़ बनाने’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन कर रहा है। इस महत्वपूर्ण आयोजन में देशभर के नीति निर्माता, शोधकर्ता, शिक्षाविद, तकनीकी विशेषज्ञ और जनजातीय कल्याण से जुड़े अधिकारी भाग लेंगे।
कार्यशाला का उद्देश्य देश के सभी जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (TRIs) के वर्तमान कार्यों की समीक्षा करना और उन्हें भविष्य में ज्ञान केंद्र, सांस्कृतिक संसाधन केंद्र तथा नीति निर्माण के प्रमुख संस्थानों के रूप में विकसित करने के लिए व्यापक राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार करना है।
प्रधानमंत्री मोदी के विजन को मिलेगा नया आयाम
यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संस्थागत क्षमता निर्माण, जनजातीय संस्कृति के संरक्षण तथा नवाचार आधारित समावेशी विकास की दिशा में केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता को मजबूत करती है। मंत्रालय का लक्ष्य अनुसंधान, तकनीक और नीति निर्माण के माध्यम से जनजातीय समुदायों के विकास को नई गति देना है।
केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम करेंगे उद्घाटन
राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम करेंगे। इस अवसर पर राज्य मंत्री दुर्गादास उइके, नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम, ओडिशा सरकार के मंत्री नित्यानंद गोंड, जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव रंजना चोपड़ा सहित केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहेंगे।
उद्घाटन सत्र के दौरान जनजातीय कार्य मंत्रालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए जाएंगे, जिससे जनजातीय अध्ययन और अनुसंधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
‘ट्राइबएक्स’ डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा लॉन्च
कार्यशाला का सबसे बड़ा आकर्षण ‘ट्राइबएक्स (TribeX)’ नामक डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म का शुभारंभ होगा। यह भारत का अपनी तरह का पहला डिजिटल शिक्षण मंच है, जिसे विशेष रूप से जनजातीय कला, संस्कृति, भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान और कौशल विकास के लिए तैयार किया गया है।
ट्राइबएक्स के माध्यम से जनजातीय विरासत का डिजिटलीकरण, दस्तावेजीकरण, ऑनलाइन शिक्षा, ज्ञान साझा करने और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही यह मंच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, नवाचार और स्थायी आजीविका के नए अवसर भी उपलब्ध कराएगा।
200 से अधिक विशेषज्ञ करेंगे विचार-विमर्श
इस राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर से लगभग 200 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। इनमें जनजातीय अनुसंधान संस्थान, राज्य जनजातीय कल्याण विभाग, विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान, तकनीकी संगठन, गैर-सरकारी संस्थाएं, उद्योग विशेषज्ञ और विकास भागीदार शामिल होंगे।
चार प्रमुख विषयों पर होगी विस्तृत चर्चा
कार्यशाला के पहले दिन विभिन्न राज्यों के जनजातीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा अपनी उपलब्धियों और चुनौतियों पर प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इसके बाद चार विषयगत समूहों में चर्चा होगी:
- जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को ज्ञान एवं सांस्कृतिक संसाधन केंद्र के रूप में विकसित करना।
- अनुसंधान, प्रलेखन और साक्ष्य आधारित नीति निर्माण को मजबूत बनाना।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जीआईएस, डिजिटल तकनीक और नवाचार का उपयोग।
- संस्थागत सुधार, मानव संसाधन विकास, सुशासन और साझेदारी को बढ़ावा देना।
AI और नई तकनीकों पर भी होगा विशेष फोकस
दूसरे दिन विशेषज्ञ सी-डैक, वाधवानी एआई, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी भुवनेश्वर, डेलॉइट और सर्वम एआई जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के सहयोग से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल परिवर्तन और तकनीकी नवाचार की भूमिका पर विशेष सत्र आयोजित करेंगे।
इन चर्चाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनजातीय अनुसंधान संस्थान भविष्य में अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए अधिक प्रभावी और सशक्त संस्थानों के रूप में विकसित हो सकें।
‘भुवनेश्वर घोषणा’ के साथ होगा समापन
दो दिवसीय कार्यशाला का समापन ‘भुवनेश्वर घोषणा’ को अपनाने के साथ होगा। इस घोषणा में जनजातीय अनुसंधान संस्थानों के संस्थागत सुधार, अनुसंधान उत्कृष्टता, तकनीकी एकीकरण, क्षमता निर्माण और राष्ट्रीय सहयोग की व्यापक रूपरेखा प्रस्तुत की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत में साक्ष्य-आधारित जनजातीय विकास, नीति निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण को नई गति देने के साथ-साथ जनजातीय समुदायों के समग्र विकास में मील का पत्थर साबित होगी।
