नई दिल्ली, 24 मार्च 2026 । Supreme Court ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अनुसूचित जाति (SC) का संवैधानिक दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक ही सीमित है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में दो टूक शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों को छोड़कर इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेता है, तो उसका SC दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। यह निर्णय न केवल कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है, बल्कि लंबे समय से चल रही सामाजिक और संवैधानिक बहस पर भी निर्णायक विराम लगाता है।
अदालत ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 341 और 1950 के राष्ट्रपति आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जातियों की पहचान ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी परिस्थितियों के आधार पर की गई थी, जो मुख्यतः हिंदू सामाजिक संरचना से जुड़ी थीं। बाद में सिख (1956) और बौद्ध (1990) समुदायों को भी इसमें शामिल किया गया, लेकिन अन्य धर्मों को इस दायरे में नहीं लाया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्लाम और ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था का वह पारंपरिक ढांचा नहीं है, जिसके आधार पर SC वर्ग को विशेष संरक्षण दिया गया है, इसलिए धर्म परिवर्तन के साथ ही उस आधार का अंत हो जाता है।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि धर्म परिवर्तन के बाद न केवल व्यक्ति का SC दर्जा समाप्त होता है, बल्कि उसका SC प्रमाणपत्र भी स्वतः अमान्य हो जाता है। इसके साथ ही वह व्यक्ति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, यानी SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण का भी दावा नहीं कर सकता। यह स्पष्ट किया गया कि कानून की नजर में SC की पहचान धर्म से जुड़ी हुई है और इसके दायरे से बाहर जाने पर उससे संबंधित सभी अधिकार और संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
यह पूरा मामला आंध्र प्रदेश के एक व्यक्ति चिंथाडा आनंद से जुड़ा था, जिन्होंने अपने साथ कथित जातिगत भेदभाव को लेकर SC/ST एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। हालांकि, जांच में यह सामने आया कि वह ईसाई धर्म अपना चुके हैं। इस आधार पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने उनकी FIR को रद्द कर दिया था। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए उनकी अपील को खारिज कर दिया और यह सिद्धांत पुनः स्थापित किया कि धर्म परिवर्तन के बाद SC की कानूनी पहचान समाप्त हो जाती है।
इस फैसले का प्रभाव व्यापक और बहुआयामी माना जा रहा है। यह उन सभी मामलों के लिए एक स्पष्ट दिशा तय करता है, जहां धर्म परिवर्तन के बावजूद अनुसूचित जाति के अधिकारों, आरक्षण या कानूनी संरक्षण का दावा किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि संविधान के प्रावधान सर्वोपरि हैं और उनका पालन अनिवार्य है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि सामाजिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों का संबंध परिस्थितियों और परिभाषाओं से जुड़ा होता है, जो धर्म परिवर्तन के साथ बदल जाते हैं।
