भारत की ऊर्जा क्रांति : इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की पूरी कहानी | अध्याय–7 (अंतिम अध्याय)
एक ऐसा सवाल जो हर भारतीय की जेब से जुड़ा है
कल्पना कीजिए कि एक सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमत अचानक 120 डॉलर प्रति बैरल पहुंच जाए। पश्चिम एशिया में युद्ध छिड़ जाए, समुद्री व्यापार बाधित हो जाए और तेल उत्पादक देश उत्पादन घटा दें। ऐसी स्थिति में सबसे पहले असर किस पर पड़ेगा?
उत्तर सीधा है आम आदमी पर।
महंगा पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने वालों की समस्या नहीं है। इसका असर ट्रकों के किराये से लेकर फल-सब्जियों की कीमत, उद्योगों की उत्पादन लागत, हवाई यात्रा, रेलवे, महंगाई और देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है। करोड़ों वाहन, हजारों उद्योग और करोड़ों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं। लेकिन एक बड़ी चुनौती यह है कि भारत अपनी आवश्यकता का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसका अर्थ है कि वैश्विक तेल बाजार में होने वाला हर उतार-चढ़ाव भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
इसी चुनौती ने भारत को वैकल्पिक ईंधनों की तलाश के लिए प्रेरित किया। इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम है इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol – EBP)।
आज जब देश E20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की ओर बढ़ चुका है, तब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि आखिर इथेनॉल क्या है, इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी और यह भारत की ऊर्जा नीति में इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता : एक कठिन वास्तविकता
स्वतंत्रता के बाद भारत ने कृषि, उद्योग और परिवहन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। लेकिन ऊर्जा के क्षेत्र में देश लंबे समय तक आयातित पेट्रोलियम पर निर्भर रहा।
जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ी, वैसे-वैसे ईंधन की मांग भी तेजी से बढ़ती गई।
आज भारत प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। इसके लिए हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हो जाए, तो भारत का आयात बिल भी बढ़ जाता है। इसका सीधा असर रुपये की विनिमय दर, व्यापार घाटे और सरकारी वित्तीय संतुलन पर पड़ता है।
यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल पेट्रोल या डीजल की उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का भी विषय है।
ऊर्जा सुरक्षा आखिर होती क्या है?
ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) का अर्थ केवल पर्याप्त ईंधन उपलब्ध होना नहीं है।
इसका अर्थ है:-
- देश के पास ऊर्जा के पर्याप्त स्रोत हों।
- आयात पर अत्यधिक निर्भरता न हो।
- वैश्विक संकटों का असर सीमित रहे।
- ईंधन की कीमतों में अनावश्यक अस्थिरता न आए।
- भविष्य की पीढ़ियों के लिए टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था विकसित हो।
इसी सोच के आधार पर भारत ने पिछले दो दशकों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बायोगैस, इलेक्ट्रिक वाहन और जैव ईंधनों को बढ़ावा देना शुरू किया। इनमें इथेनॉल सबसे तेजी से विकसित होने वाला विकल्प बनकर सामने आया।
इथेनॉल क्या है?
इथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है, लेकिन इसका उपयोग केवल औद्योगिक या पेय पदार्थों तक सीमित नहीं है। इसे जैव ईंधन (Biofuel) के रूप में भी व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
यह मुख्य रूप से निम्न स्रोतों से तैयार किया जाता है:-
- गन्ने का रस
- शीरा (Molasses)
- मक्का
- टूटा हुआ चावल
- अधिशेष खाद्यान्न
- अन्य कृषि आधारित जैविक पदार्थ
इथेनॉल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नवीकरणीय (Renewable) है। यानी इसे हर वर्ष कृषि उत्पादन के माध्यम से दोबारा तैयार किया जा सकता है, जबकि कच्चा तेल सीमित प्राकृतिक संसाधन है।
दुनिया ने इथेनॉल को कब अपनाया?
अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि इथेनॉल एक नई तकनीक है, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है।
इतिहास बताता है कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में ही ऑटोमोबाइल उद्योग के अग्रणी हेनरी फोर्ड ने अपनी प्रसिद्ध मॉडल-टी कार को इस तरह डिज़ाइन किया था कि वह इथेनॉल आधारित ईंधन पर भी चल सके।
इसके बाद अमेरिका और ब्राजील ने बड़े पैमाने पर इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम विकसित किए। विशेष रूप से ब्राजील ने गन्ना आधारित इथेनॉल उत्पादन में दुनिया का नेतृत्व किया और आज वहां कई वाहन उच्च प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलते हैं।
भारत ने इन देशों के अनुभवों का अध्ययन करते हुए अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप मॉडल विकसित किया।
भारत में इथेनॉल मिशन की शुरुआत कैसे हुई?
बहुत से लोगों को लगता है कि इथेनॉल कार्यक्रम हाल के वर्षों में शुरू हुआ, जबकि इसकी शुरुआत लगभग 25 वर्ष पहले हो चुकी थी।
वर्ष 2001 में भारत सरकार ने एक प्रायोगिक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम शुरू किया।
2004 में इसे औपचारिक रूप दिया गया।
2006 तक कई राज्यों में E5 (5 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण) लागू किया गया।
इसके बावजूद उत्पादन क्षमता सीमित होने के कारण कार्यक्रम अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया। वर्ष 2014 तक इथेनॉल मिश्रण लगभग 1.5 प्रतिशत के आसपास ही बना रहा।
यानी समस्या नीति की नहीं, बल्कि उत्पादन क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था की थी।
2018 : जब पूरी रणनीति बदल गई
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के इथेनॉल मिशन का वास्तविक मोड़ वर्ष 2018 था।
राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति लागू होने के बाद सरकार ने केवल मिश्रण लक्ष्य तय करने के बजाय पूरे इकोसिस्टम को विकसित करना शुरू किया।
नई नीति के प्रमुख उद्देश्य थे:-
- इथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाना।
- किसानों को वैकल्पिक बाजार उपलब्ध कराना।
- निजी निवेश आकर्षित करना।
- सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को दीर्घकालिक खरीद व्यवस्था देना।
- बैंकों के माध्यम से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।
- कृषि आधारित कच्चे माल का दायरा बढ़ाना।
यहीं से भारत का इथेनॉल मिशन एक सीमित कार्यक्रम से निकलकर राष्ट्रीय ऊर्जा अभियान में बदल गया।
जब कई मंत्रालय एक साथ आए
इथेनॉल कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसे केवल पेट्रोलियम मंत्रालय तक सीमित नहीं रखा गया।
इसमें शामिल हुए—
- पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय
- खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय
- भारी उद्योग मंत्रालय
- नीति आयोग
- भारतीय रेलवे
- सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक
इस समन्वित प्रयास ने उत्पादन, परिवहन, भंडारण और वितरण की पूरी श्रृंखला को मजबूत किया।
क्यों जरूरी था यह बदलाव?
भारत की जनसंख्या बढ़ रही है।
वाहनों की संख्या बढ़ रही है।
औद्योगिक गतिविधियां लगातार विस्तार कर रही हैं।
ऐसे में यदि देश केवल आयातित तेल पर निर्भर रहता, तो आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बन सकती थी।
इसीलिए इथेनॉल कार्यक्रम को केवल पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एक रसायन के रूप में नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के रूप में देखा जाने लगा।
भारत का इथेनॉल मिशन किसी एक सरकार, एक वर्ष या एक निर्णय का परिणाम नहीं है। यह लगभग ढाई दशक में विकसित हुई एक राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य केवल ईंधन मिश्रण बढ़ाना नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय, पर्यावरण संरक्षण और विदेशी मुद्रा बचत जैसे व्यापक लक्ष्यों को हासिल करना है।
आज E20 को लेकर जो बहस चल रही है, उसे समझने के लिए इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। क्योंकि किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके अंतिम परिणाम से पहले उसकी पूरी यात्रा को समझे बिना नहीं किया जा सकता।
