नई दिल्ली, 27.04.26 | दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के जाफरपुर कलां के रावता गांव में पुलिस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बिहारी होना ही अब सबसे बड़ा अपराध है। स्पेशल सेल का हेड कांस्टेबल नीरज बलहारा नशे में चूर होकर एक निर्दोष जन्मदिन पार्टी से लौट रहे बिहारियों को देखते ही जानवर बन गया। उसने अपनी सरकारी ग्लॉक पिस्टल निकाली और ठंडे खून से युवकों की जिंदगी छीन ली। एक गोली ने एक मासूम को मौत के घाट उतार दिया और दूसरा जिंदगी और मौत से जूझ रहा था जिसकी भी मौत हो गई।
नफरत, नशा और पुलिस की बर्बरता का सबसे घिनौना प्रदर्शन
शनिवार रात रूपेश कुमार (खगड़िया, बिहार) के दो साल के बेटे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। खुशियों के बाद जब मेहमान लौट रहे थे, तो सड़क पर 13 लोग खड़े थे जिनमें दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे।
21 साल का फूड डिलीवरी एजेंट पांडव, 30 साल का कृष्ण और दीपक मोटरसाइकिल पर सवार थे। तभी दिल्ली पुलिस का हेड कांस्टेबल नीरज बलहारा नशे की हालत में आ पहुंचा। जैसे ही उसे पता चला कि ये लोग बिहार से हैं और अपनी मातृभाषा मैथिली/अंगिका में बात कर रहे हैं, वह राक्षस बन गया।
उसने बिहारियों को लेकर बेहद गंदी, अश्लील, जातिवादी और अपमानजनक गालियां बरसाईं। फिर बिना किसी छोटे-से उकसावे के पिस्तौल निकाल ली, मोटरसाइकिल के हैंडल पर टिकाई और पांडव के सीने पर ठंडे खून से निशाना साधकर गोली दाग दी। गोली पांडव के सीने को चीरती हुई निकली और पीछे बैठे कृष्ण के पेट में घुस गई।
पांडव मौके पर ही तड़प-तड़पकर मर गया। कृष्ण खून से लथपथ गिरा, अस्पताल पहुंचाया गया लेकिन वह भी दम तोड़ गया।
(source: Media reports, TOI, etc)
बिहारी होना = मौत का वारंट
पांडव सिर्फ 21 साल का था। वह परिवार की रोटी-रोटी के लिए दिल्ली में फूड डिलीवरी करता था। कृष्ण भी उसी समूह का था। दोनों का कोई जुर्म नहीं था सिवाय इसके कि वे बिहार से थे। वे सिर्फ एक मासूम बच्चे के जन्मदिन पर आए थे।
पांडव की मां मीना देवी का दिल दहला देने वाला रोना है “जैसे ही उसे पता चला कि हम बिहार से हैं, उसने गोलियां चला दी। मेरा बेटा बिल्कुल निर्दोष था।”
अब सवाल ये नहीं कि हत्या हुई। सवाल ये है क्या दिल्ली में बिहार से आए हर युवक को पुलिस की गोली का इंतजार करना चाहिए? क्या अपनी भाषा बोलना, रात में सड़क पर खड़ा होना और बिहारी होना अब खुला मौत का आमंत्रण बन गया है?
दिल्ली पुलिस प्रशासन की पूरी तरह सड़ चुकी, भ्रष्ट और पक्षपाती व्यवस्था
- नीरज बलहारा 2006 से पुलिस में था। पिछले 15 साल से रावता गांव में किराए पर रह रहा था। स्थानीय लोग सालों से शिकायत करते थे कि वह आक्रामक, बदतमीज, नशेड़ी और हिंसक है। फिर भी दिल्ली पुलिस ने उसे न तो काउंसलिंग दी, न नशा छुड़वाया, न सस्पेंड किया, न कोई जांच कराई। क्यों? क्योंकि विभाग को बिहारियों के खिलाफ इसी हिंसा और नफरत पसंद थी।
घटना के बाद आरोपी ने मोबाइल बंद करके भागने की कोशिश की। पुलिस ने रोहतक के पास से गिरफ्तार किया लेकिन ये सिर्फ दिखावा और बचाव का नाटक है।
अब दिल्ली पुलिस की तरफ से प्रेस ब्रीफिंग आएगी। हेडक्वार्टर में माइक पर बैठकर अधिकारी गंभीर चेहरे के साथ घोषणा करेंगे “हमने आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया है, उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी और विभाग इस मामले को बहुत गंभीरता से ले रहा है।”
दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर में बैठे अलग-अलग मीडिया संस्थानों के रिपोर्टर और एंकर अब लिपापोती में जुट जाएंगे। वे पुलिस की छवि बचाने के लिए हर तरह का डैमेज कंट्रोल करेंगे। कुछ चैनल “एक व्यक्ति की गलती पूरे विभाग को दोष नहीं दी जा सकती” की थाली बजाएंगे, कुछ अखबार पुलिस की “तत्परता” की तारीफ करेंगे और पूरा मामला “एकल घटना” बताकर रफा-दफा करने की कोशिश की जाएगी।
अंत में पीड़ित परिवार एवं गवाहों को खुलेआम या चुपके-चुपके डराया-धमकाया जाएगा, चुप रहने के लिए लालच दिया जाएगा, आर्थिक मदद का झांसा दिखाया जाएगा और समझौते का भारी दबाव बनाया जाएगा। और कुछ महीनों बाद हम सुनेंगे कि यह कातिल जमानत पर बाहर आ गया है। फिर उसे किसी शांत थाने या शंटिंग पोस्टिंग पर भेज दिया जाएगा, जहां वह फिर से वर्दी पहनकर घूमेगा और शायद फिर कभी किसी और बिहारी युवक पर गुस्सा उतारेगा।
क्या भविष्य में ऐसा नहीं होगा?
दुख की बात यह है कि दिल्ली पुलिस के इतिहास में ज्यादातर ऐसे मामलों में यही होता आया है। सिस्टम अपने लोगों को बचाने में माहिर है, जबकि निर्दोष परिवार न्याय की भीख मांगते रह जाते हैं।
पांडव कभी वापस नहीं आएगा। कृष्ण भी नहीं। दो युवा जिंदगियां, दो परिवार हमेशा के लिए बर्बाद हो गए। एक मासूम बच्चे का जन्मदिन अब दो परिवारों के लिए आजीवन आंसू, गम और बदले की आग का दिन बन गया।
दिल्ली पुलिस की वर्दी अब बिहार के दोनों युवाओं के लिए मौत का सबसे काला और सबसे खूनी प्रतीक बन चुकी है। अगर प्रशासन अभी भी आंखें मूंदे बैठा रहा, तो आने वाले दिनों में और दर्जनों पांडव और कृष्ण पुलिस की गोलियों का शिकार बनेंगे।
बिहार के युवा बेहद सावधान और चौकन्ने रहें!
दिल्ली में अब पुलिस से भी ज्यादा डरना होगा।
क्योंकि यहां कानून का रक्षक खुद सबसे बड़ा हत्यारा, सबसे बड़ा भक्षक और बिहारियों का सबसे क्रूर दुश्मन बन चुका है।
दिल्ली पुलिस अपनी वर्दी के रंग को लाल से रंग दो
दिल्ली पुलिस तुम्हारे एक बंदे की वजह से अब बिहारियों के लिए ये संस्थान सुरक्षा नहीं, बल्कि खुला खतरा बनने के मध्य तक पहुँच चुका है।
आने वाला वक्त दिल्ली पुलिस को सिर्फ कृष्ण और पांडव के खूनी सिपाही के रूप में याद रखेगा।
