1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम
नई दिल्ली,29 जनवरी 2026 | देश में स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और परिपत्र अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 को अधिसूचित कर दिया है। ये नए नियम पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत जारी किए गए हैं और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का स्थान लेंगे। संशोधित नियम 01 अप्रैल, 2026 से पूरे देश में लागू होंगे।
नए नियमों का उद्देश्य कचरे के कुशल प्रबंधन, स्रोत पर पृथक्करण, जवाबदेही तय करने और प्रदूषण को न्यूनतम करने के साथ-साथ परिपत्र अर्थव्यवस्था और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) को व्यवहार में उतारना है। इसके तहत अपशिष्ट प्रबंधन की पूरी श्रृंखला को पारदर्शी, तकनीक-आधारित और जवाबदेह बनाया गया है।
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत और पर्यावरणीय मुआवजा
नियमों में ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। बिना पंजीकरण के संचालन, गलत रिपोर्टिंग, जाली दस्तावेज प्रस्तुत करने या ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की गलत प्रथाओं पर पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दिशा-निर्देश तैयार करेगा, जबकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियां मुआवजा लगाने की कार्रवाई करेंगी।
स्रोत पर चार-स्तरीय अपशिष्ट पृथक्करण अनिवार्य
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के तहत स्रोत पर चार-स्तरीय पृथक्करण अनिवार्य कर दिया गया है। इसके अंतर्गत अपशिष्ट को गीला अपशिष्ट, सूखा अपशिष्ट, स्वच्छता अपशिष्ट और विशेष देखभाल अपशिष्ट में अलग-अलग करना होगा। गीले अपशिष्ट का निपटान खाद निर्माण या जैव-मेथेनिकरण के माध्यम से किया जाएगा, जबकि सूखे अपशिष्ट को सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाओं (MRF) में भेजकर पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जाएगा। स्वच्छता और विशेष देखभाल अपशिष्ट के लिए सुरक्षित संग्रह और अधिकृत एजेंसियों द्वारा निपटान अनिवार्य होगा।
थोक अपशिष्ट उत्पादकों की स्पष्ट जिम्मेदारी
नए नियमों में थोक अपशिष्ट उत्पादकों की स्पष्ट परिभाषा तय की गई है। 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल, 40,000 लीटर प्रतिदिन या उससे अधिक जल खपत, अथवा 100 किलोग्राम प्रतिदिन या उससे अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करने वाली संस्थाओं को थोक अपशिष्ट उत्पादक माना जाएगा। ऐसे उत्पादकों को अपने परिसर में ही गीले अपशिष्ट का यथासंभव प्रसंस्करण करना होगा या वैकल्पिक रूप से ईबीडब्ल्यूजीआर प्रमाणपत्र लेना होगा। इससे शहरी स्थानीय निकायों पर बोझ कम होने और विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
ऑनलाइन ट्रैकिंग, तीव्र भूमि आवंटन और ऑडिट अनिवार्य
नियमों के तहत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया उत्पादन से लेकर निपटान तक की ऑनलाइन ट्रैकिंग और निगरानी के लिए एक केंद्रीकृत पोर्टल विकसित किया जाएगा। अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं का पंजीकरण, अनुमति, रिपोर्टिंग और ऑडिट इसी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन किया जाएगा। इसके साथ ही अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं निपटान सुविधाओं के लिए तीव्र भूमि आवंटन का भी प्रावधान किया गया है, जिसमें बफर ज़ोन के स्पष्ट मानदंड तय होंगे।
आरडीएफ उपयोग, लैंडफिल पर सख्ती और पुराने कचरा स्थलों की सफाई
नए नियमों में अपशिष्ट से प्राप्त ईंधन (RDF) के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है। सीमेंट संयंत्रों और अपशिष्ट-से-ऊर्जा संयंत्रों में आरडीएफ के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर छह वर्षों में 15 प्रतिशत तक किया जाएगा। साथ ही लैंडफिलिंग पर सख्ती करते हुए केवल गैर-पुनर्चक्रणीय और अक्रिय अपशिष्ट को ही लैंडफिल में डालने की अनुमति होगी। पुराने कचरा स्थलों का समयबद्ध जैव खनन और जैव उपचार अनिवार्य किया गया है।
पहाड़ी और द्वीपीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान
पहाड़ी क्षेत्रों और द्वीपों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए अलग प्रावधान किए गए हैं। पर्यटकों से उपयोगकर्ता शुल्क वसूलने, गैर-बायोडिग्रेडेबल अपशिष्ट के लिए विशेष संग्रहण केंद्र और स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जाएगा। होटल और रेस्तरां को गीले अपशिष्ट के स्थानीय निपटान की जिम्मेदारी दी गई है।
नई ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के साथ भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास अब नीतिगत प्राथमिकता हैं। ये नियम न केवल शहरी कचरा प्रबंधन को मजबूत करेंगे, बल्कि हरित अर्थव्यवस्था और स्वच्छ भारत के लक्ष्य को भी नई गति देंगे।
