नई दिल्ली , 24.JAN.2026 | भारत सरकार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ की तरह ही सम्मान दिलाने के लिए एक औपचारिक प्रोटोकॉल और नियम बनाने पर विचार कर रही है। गृह मंत्रालय की एक उच्चस्तरीय बैठक में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई, जिसमें यह देखा गया कि क्या वंदे मातरम के समय खड़े होना, अनुशासन क्या होना चाहिए और सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके गायन के नियम को कानूनी रूप से तय किया जाना चाहिए। फिलहाल राष्ट्रीय गीत को संविधान में राष्ट्रगान के समान सम्मान प्राप्त है, लेकिन उसके लिए कोई स्पष्ट शिष्टाचार, कानूनी ज़रूरत या दंडात्मक प्रावधान मौजूद नहीं है।
वंदे मातरम् भारत की स्वतंत्रता चेतना, सांस्कृतिक आत्मा और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक गीत है। इसकी रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में की थी। यह गीत पहली बार उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (1882) में प्रकाशित हुआ, जिसकी पृष्ठभूमि संन्यासी विद्रोह और विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष पर आधारित थी।“वंदे मातरम्” मूलतः संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण में लिखा गया गीत है, जिसमें मातृभूमि को देवी के रूप में नमन किया गया है। इस गीत में भारत को प्राकृतिक संपदा, करुणा, शक्ति और संस्कृति से परिपूर्ण मां के रूप में चित्रित किया गया है। यही भाव आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बन गया।स्वतंत्रता संग्राम के दौरान “वंदे मातरम्” केवल एक गीत नहीं रहा, बल्कि यह क्रांतिकारियों का नारा बन गया। 1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर देशभर में होने वाले आंदोलनों तक, यह गीत जन-जन के मुख से गूंजने लगा। लाला लाजपत राय, अरविंद घोष और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय चेतना का स्वर बताया। ब्रिटिश शासन ने इसकी लोकप्रियता से भयभीत होकर कई बार इसके गायन पर प्रतिबंध भी लगाया।आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने “वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, जबकि “जन गण मन” को राष्ट्रगान घोषित किया गया। संविधान सभा ने स्पष्ट किया कि दोनों को समान सम्मान प्राप्त होगा, क्योंकि दोनों ही भारत की राष्ट्रीय भावना और एकता का प्रतिनिधित्व करते हैं।वंदे मातरम् की कहानी संघर्ष, बलिदान और आत्मसम्मान की कहानी है। यह गीत भारत के उस दौर की याद दिलाता है, जब आज़ादी केवल एक सपना थी और इस सपने को साकार करने के लिए लाखों लोगों ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। आज भी वंदे मातरम् न केवल अतीत की स्मृति है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रप्रेम, कर्तव्य और एकता का शाश्वत संदेश है।
बैठक में यह भी विचार किया गया कि क्या ‘वंदे मातरम’ के गायन के दौरान भी लोग ‘जन गण मन’ की तरह सम्मान दिखाने के लिए खड़े हों, और क्या किसी भी प्रकार के अपमान के लिये दंड शामिल किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में यह प्रस्तावित है कि नियमों को तय करके राष्ट्रीय गीत को भी ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश मिले, जैसा कि राष्ट्रीय गान के लिए पहले से निर्धारित है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 51A(a) के तहत नागरिकों पर राष्ट्रगान का सम्मान करना एक मौलिक कर्तव्य है, और राष्ट्रीय गीत को समान सम्मान प्राप्त है, लेकिन अभी तक उसके पालन के लिए विस्तृत कार्यकारी आदेश या औपचारिक निर्देश नहीं है। सरकार इस अंतर को मिटाने और ‘वंदे मातरम’ की प्रतिष्ठा को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इन नियमों पर विचार कर रही है।
केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम’ के लिये साल भर चलने वाला एक विशेष उत्सव भी घोषित किया है और इसे देश की एकता, संस्कृति और राष्ट्रीय भावना को बढ़ाने वाला बड़ा कदम बताया जा रहा है। यह कदम इस ऐतिहासिक गीत को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से और भी सम्मानित बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
