NFHS-5 आधारित MPI रिपोर्ट में बिहार के जिलों की गरीबी स्थिति
पटना , 12.Jan . 2026 | NFHS-5 पर आधारित बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) ने बिहार के सामाजिक-आर्थिक विकास की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि बिहार में गरीबी केवल आय की समस्या नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर से जुड़ा एक गहरा मानवीय संकट है। जिलावार आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि राज्य के भीतर ही विकास की असमानता अत्यंत गहरी है।
बिहार भारत के उन राज्यों में शामिल है जहाँ सामाजिक एवं आर्थिक विकास की गति ऐतिहासिक, भौगोलिक और नीतिगत कारणों से अपेक्षाकृत धीमी रही है। प्रस्तुत चित्र में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) पर आधारित बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार बिहार के जिलों में गरीबी की स्थिति को प्रतिशत के रूप में दर्शाया गया है। यह आँकड़े केवल आय-आधारित गरीबी को नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर जैसे बुनियादी आयामों में अभाव को भी रेखांकित करते हैं। यही कारण है कि ये आँकड़े बिहार की वास्तविक सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। स्पष्ट रूप से यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि बिहार में गरीबी न केवल व्यापक है, बल्कि जिलावार असमानता भी अत्यधिक गहरी है।
सबसे पहले यदि समग्र परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि बिहार में गरीबी का स्तर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। चित्र में उल्लिखित प्रमुख तथ्यों के अनुसार राज्य के कई जिलों में 30 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या बहुआयामी गरीबी में जीवन यापन कर रही है। यह स्थिति न केवल आर्थिक पिछड़ेपन का संकेत देती है, बल्कि सामाजिक संरचना, प्रशासनिक क्षमता और विकास योजनाओं की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है। विशेष रूप से उत्तर और पूर्वी बिहार के जिले गरीबी के मामले में अधिक प्रभावित दिखाई देते हैं, जबकि दक्षिण और मध्य बिहार के कुछ जिले अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं।
जिलावार आँकड़ों पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि अररिया (52.07%), किशनगंज (49.44%) और पूर्णिया (48.00%) बिहार के सर्वाधिक गरीब जिले हैं। इन जिलों में लगभग आधी या उससे अधिक आबादी बहुआयामी गरीबी से ग्रस्त है। यह तथ्य अत्यंत चिंताजनक है क्योंकि यह केवल अल्प आय का प्रश्न नहीं, बल्कि कुपोषण, अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएँ, कम शैक्षणिक उपलब्धियाँ और निम्न जीवन-स्तर का द्योतक है। अररिया और किशनगंज जैसे सीमावर्ती जिलों में ऐतिहासिक रूप से बुनियादी ढाँचे की कमी, सीमित औद्योगिक गतिविधियाँ और प्रशासनिक उपेक्षा ने गरीबी को और गहरा किया है।
मध्यम श्रेणी के गरीब जिलों में मधुबनी (44.56%), सहरसा (42.98%), सुपौल (42.71%), कटिहार (41.88%) और सीतामढ़ी (38.93%) जैसे जिले शामिल हैं। ये जिले यह दर्शाते हैं कि बिहार में गरीबी केवल कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमटी नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संरचनात्मक समस्या है। इन जिलों में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक होना, बार-बार आने वाली बाढ़, तथा गैर-कृषि रोजगार के अवसरों की कमी गरीबी के प्रमुख कारणों में से हैं। इसके अतिरिक्त, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में कमी भी गरीबी के चक्र को तोड़ने में बाधक बनी हुई है।
पूर्वी चंपारण (38.47%), शिवहर (36.48%), दरभंगा (35.47%) और मधुबनी जैसे जिले यह दर्शाते हैं कि मिथिलांचल और सीमांचल क्षेत्र बिहार के सबसे अधिक गरीबी-प्रभावित क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन ऐतिहासिक रूप से गहराई से जड़ें जमाए हुए है। भूमि जोत का अत्यधिक विखंडन, पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ, सीमित सिंचाई सुविधाएँ और औद्योगिक निवेश का अभाव यहाँ की प्रमुख समस्याएँ हैं। इन कारणों से यहाँ के युवा बड़ी संख्या में पलायन करने को विवश होते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और भी कमजोर होती जाती है।
इसके विपरीत यदि अपेक्षाकृत कम गरीबी वाले जिलों की बात की जाए तो पटना (13.17%), अरवल (19.33%) और जहानाबाद (19.56%) जैसे जिले सामने आते हैं। विशेष रूप से पटना, जो बिहार की राजधानी है, सबसे कम गरीबी वाला जिला है। इसका मुख्य कारण यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक सेवाओं और रोजगार के अपेक्षाकृत बेहतर अवसरों का उपलब्ध होना है। पटना में सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियाँ, उच्च शिक्षण संस्थान और बेहतर बुनियादी ढाँचा लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलने में सहायता करता है। यह तुलना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि शहरीकरण, प्रशासनिक केंद्रों की उपस्थिति और निवेश गरीबी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चित्र में दिए गए तथ्यों के अनुसार अमीर और गरीब जिलों के बीच की खाई अत्यंत स्पष्ट है। जहाँ एक ओर अररिया और किशनगंज जैसे जिलों में आधी से अधिक आबादी गरीब है, वहीं दूसरी ओर पटना जैसे जिले में यह प्रतिशत 15 से भी कम है। यह असमानता केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय विकास के स्तर पर भी दिखाई देती है। यही असमानता बिहार की विकास नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि एक समान नीति सभी जिलों की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।
गरीबी निर्धारण के पैमाने पर यदि विचार किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि NFHS-5 आधारित बहुआयामी गरीबी सूचकांक केवल आय को नहीं देखता, बल्कि तीन प्रमुख आयामों—स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर—को सम्मिलित करता है। स्वास्थ्य के अंतर्गत पोषण की स्थिति, बाल मृत्यु दर और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को शामिल किया गया है। शिक्षा के अंतर्गत स्कूली शिक्षा के वर्ष और विद्यालय में उपस्थिति को मापा गया है। जीवन-स्तर के अंतर्गत खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता, पीने का पानी, बिजली, आवास, संपत्ति और स्वच्छता जैसी सुविधाओं को देखा गया है। इस प्रकार, यह सूचकांक गरीबी को एक समग्र मानवीय अभाव के रूप में परिभाषित करता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार के कई जिलों में आय भले ही थोड़ी बेहतर हो, लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा के संकेतक कमजोर होने के कारण वे बहुआयामी गरीबी की श्रेणी में आ जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ जिलों में सरकारी योजनाओं के कारण बिजली या आवास की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन कुपोषण और शिक्षा की गुणवत्ता अभी भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि गरीबी उन्मूलन केवल नकद सहायता या आय बढ़ाने से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए मानव विकास के सभी आयामों पर एक साथ कार्य करना आवश्यक है।
उत्तर और पूर्वी बिहार के जिलों में गरीबी का अधिक होना यह संकेत देता है कि भौगोलिक और प्राकृतिक कारक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बाढ़-प्रभावित क्षेत्र, सीमावर्ती जिले और कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था वाले इलाके विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं। बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ इन क्षेत्रों की आर्थिक स्थिरता को कमजोर करती हैं और विकास योजनाओं के दीर्घकालिक प्रभाव को सीमित कर देती हैं। इसके अतिरिक्त, सीमांचल क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन और अल्पसंख्यक बहुल आबादी के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य संकेतकों में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है।
यदि नीति-दृष्टि से देखा जाए तो ये आँकड़े स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि बिहार में गरीबी उन्मूलन के लिए क्षेत्र-विशेष आधारित रणनीति की आवश्यकता है। जिन जिलों में 40 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी में जीवन यापन कर रही है, वहाँ प्राथमिकता के आधार पर स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और बुनियादी ढाँचे में निवेश किया जाना चाहिए। वहीं अपेक्षाकृत बेहतर जिलों में रोजगार सृजन और कौशल विकास पर ध्यान देकर समग्र विकास की गति को और तेज किया जा सकता है।
इन आँकड़ों का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि गरीबी की यह असमानता सामाजिक असंतोष और विकास के असंतुलन को जन्म दे सकती है। यदि कुछ जिले निरंतर पिछड़े रह जाते हैं, तो राज्य के भीतर ही एक प्रकार की आंतरिक विभाजन रेखा खिंच जाती है। इससे न केवल आर्थिक असमानता बढ़ती है, बल्कि सामाजिक समरसता और राजनीतिक स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, बिहार के विकास मॉडल को समावेशी और संतुलित बनाना समय की आवश्यकता है।
अंततः, प्रस्तुत चित्र में दिए गए तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि बिहार की गरीबी केवल आँकड़ों का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा एक मानवीय प्रश्न है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के माध्यम से यह समझ में आता है कि गरीबी का अर्थ केवल कम आय नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने के अवसरों का अभाव है। जब तक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर में समान सुधार नहीं होगा, तब तक गरीबी उन्मूलन के प्रयास अधूरे रहेंगे।
बिहार में जिलावार गरीबी की यह तस्वीर नीति-निर्माताओं, प्रशासन और समाज सभी के लिए एक चेतावनी है। यह आँकड़े यह दर्शाते हैं कि विकास की राह पर आगे बढ़ने के लिए केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानव विकास के सभी आयामों पर समान रूप से ध्यान देना होगा। यदि इन तथ्यों के आधार पर ठोस, क्षेत्र-विशेष और दीर्घकालिक नीतियाँ बनाई जाएँ, तो बिहार न केवल गरीबी से बाहर निकल सकता है, बल्कि एक समावेशी और सतत विकास का मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।
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