जयपुर/नई दिल्ली,05.Feb.26। भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता रानू पाराशर ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख की पुस्तक के हवाले से प्रधानमंत्री पर लगाए गए आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें तथ्यहीन, भ्रामक और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का उदाहरण बताया है।
रानू पाराशर ने कहा कि राहुल गांधी का बयान न केवल तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा पर भ्रम फैलाने की खतरनाक कोशिश भी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सेना, सीमा और देश की सुरक्षा जैसे विषय दलगत राजनीति से ऊपर होते हैं, और इन पर बयानबाज़ी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है।
उन्होंने भारत-चीन संबंधों के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध केवल सैन्य पराजय नहीं था, बल्कि उस समय के कांग्रेस नेतृत्व की रणनीतिक, कूटनीतिक और प्रशासनिक विफलताओं का परिणाम था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नीतिगत कमजोरियाँ, चीन पर अत्यधिक भरोसा और सैन्य तैयारियों की उपेक्षा ने देश को भारी नुकसान पहुँचाया, जिसका प्रभाव दशकों तक भारत की सुरक्षा नीति पर देखा गया।
भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि उस कठिन दौर में जब भारतीय सेना संसाधनों और रसद की कमी से जूझ रही थी, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने राष्ट्रधर्म निभाते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना की सहायता की। सप्लाई लाइन को बनाए रखने, रसद पहुँचाने और स्थानीय सहयोग देने में उनका योगदान ऐतिहासिक रूप से दर्ज है। संकट के समय राष्ट्रवादी समाज सेना के साथ खड़ा रहा, जबकि कांग्रेस नेतृत्व नीतिगत भ्रम में उलझा रहा यह अंतर देश भली-भाँति जानता है।
राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख की पुस्तक के चुनिंदा अंशों के आधार पर प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने के प्रयास पर सवाल उठाते हुए रानू पाराशर ने कहा कि यह अपने ऐतिहासिक दायित्वों और विफलताओं से ध्यान भटकाने की राजनीति है। आधे-अधूरे संदर्भों के साथ बयान देना न केवल सेना के मनोबल को प्रभावित करता है, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों के भी विरुद्ध है।उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी सैन्य चुनौती के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण सदैव संवैधानिक परंपराओं और संस्थागत संतुलन पर आधारित रहा है। सेना को ऑपरेशनल स्वतंत्रता देना राजनीतिक कमजोरी नहीं, बल्कि पेशेवर सैन्य नेतृत्व पर विश्वास का प्रतीक है।
रानू पाराशर ने कहा कि पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे के कार्यकाल में सरकार और सेना के बीच समन्वय अभूतपूर्व रूप से मजबूत रहा। इसी अवधि में सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, पुलों, सैन्य ढांचे और लॉजिस्टिक्स क्षमताओं में ऐतिहासिक विस्तार हुआ, जिसने भारत की रक्षा तैयारियों को नई मजबूती प्रदान की।संसद में “बोलने से रोके जाने” के राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर चर्चा की निर्धारित संसदीय मर्यादाएँ होती हैं। इन प्रक्रियाओं की अनदेखी कर राजनीतिक शोर मचाना कांग्रेस की पुरानी रणनीति रही है। संसद बहस का मंच है, किंतु जिम्मेदारी और मर्यादा उसकी अनिवार्य शर्त है।
अपने बयान के अंत में रानू पाराशर ने कहा कि केंद्र सरकार ने हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। सीमावर्ती बुनियादी ढांचे, आधुनिक हथियारों, सैन्य उपकरणों और रणनीतिक क्षमताओं में हुआ अभूतपूर्व निवेश इसका प्रमाण है। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर भ्रम फैलाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति को दर्शाती है, जिसे देश की जनता भली-भाँति समझती है।उन्होंने कहा कि देश की जनता इतिहास से परिचित है, वर्तमान को देख रही है और भविष्य का आकलन भी कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत न दबेगा, न झुकेगा और न ही अपनी सेना को कभी अकेला छोड़ेगा। सशक्त नेतृत्व, मजबूत सेना और राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रतिबद्धता ही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
